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Saturday, 25 July 2009

...अछ्छी नही लगती


जो दिलों को तोड़ दे वो अफसुरदगी,अछ्छी नही लगती

ला के ऐसे मोड़ पर यों बेरूखी,अछ्छी नही लगती

अब तो बस दुनिया का ये है फलसफा

मुफ्लिसों के घर में हो रौशनी,अछ्छी नही लगती

मुद्दतों से कैद हूँ दुनिया के इस जंजाल में

प्यार है क्या चीज़ और दीवानगी, अछ्छी नही लगती

तुम हमें जब से मिले सारा जहां अपना हुआ

मुझ को अब तेरे सिवा की दोस्ती, अछ्छी नही लगती

अब हमेशा आंख मे आंसू लिए फिरता हूँ मैं

मेरे चेहरे पर उसे कोई हंसी, अछ्छी नही लगती

तेरा चेहरा भी गुलाबों की तरह खिलता रहे

आंख में तेरे हमें कोई नमी, अछ्छी नही लगती

प्यार ही जब रूठ कर हो जाए इस दिल से जुदा

घर में हो कोई खुशी, अछ्छी नही लगती

11 comments:

M VERMA said...

प्यार ही जब रूठ कर हो जाए इस दिल से जुदा
घर में हो कोई खुशी, अछ्छी नही लगती
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बहुत सुन्दर अभिव्यक्त किया है आपने तो.

अर्चना तिवारी said...

तुम हमें जब से मिले सारा जहां अपना हुआ

मुझ को अब तेरे सिवा की दोस्ती, अछ्छी नही लगती...

sunder rachna

adwet said...

tera chehra gulabon ki trah khilta rahe
vah kya bat hai.

शारदा अरोरा said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी है
इश्क में ऐसा ही होता है कि कोई और बात तक अच्छी नहीं लगती | क्या ' मुझ को अब तेरे सिवा की दोस्ती, अछ्छी नही लगती...'
की जगह पर ' मुझ को अब तेरे सिवा किसी की दोस्ती, अच्छी नही लगती...'लिखा जा सकता है ?
बधाई हो आप वो कशिश बयान कर पाए हैं |

AlbelaKhatri.com said...

kya khoob kaha...............
bahut khoob kaha !

ओम आर्य said...

BAHUT HI KHUB ......SAHI HAI AISA HI HOTA HAI JAB WO RUTH JAYE

‘नज़र’ said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!
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1. विज्ञान । HASH OUT SCIENCE
2. चाँद, बादल और शाम

Sonalika said...

kya baat hai razi shahab

अब तो बस दुनिया का ये है फलसफा

मुफ्लिसों के घर में हो रौशनी,अछ्छी नही लगती

तरक्‍की कर रहे हो मुबारक हो

Mithilesh dubey said...

बहुत सुन्दर हि गजल है..

vandana said...

bahut hi umda khyal hain.

vandana-zindagi.blogspot.com

Nidhi said...

hey Razi,

when u really love some it's happens...