Saturday, 4 July 2009
यादों की कुर्चियाँ
समंदर से आती लहरों के बीच ..साहिल की रेत पर ...सूखे खुजूर के पेड़ के नीचे बैठ कर भूरी आंखों ...काली जुल्फों वाला शहजादा ...पुरनम आंखों ...घम्ज़दा दिल के साथ ...ऐसा लगता था जैसे बीते दिनों की यादें ...टूटे सपनों और बिखरे खुवाबों की कुर्चियों को अपनी पलकों से चुनने की ..नाकाम कोशिश कर रहा था ...
4 comments:
बहोत ही खुबसूरत खयालात ... बहोत बहोत बधाई...
अर्श
ek alag sa par najuk khayalat dikhata........
अपना ही अंदाज़ है
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तख़लीक़-ए-नज़र
बेहतरीन
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