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Wednesday, 28 October 2009

करवट

उम्र के एक पड़ाव पर आकर ज़िन्दगी ज़ोर ज़ोर से सासें लेने लगती है...शायद थक चुकी होती है या बहुत ज़्यादा शरारतें उसकी सांसें तोडने लगती हैं या फिर यह वक्त का तक़ाज़ा होता है... कुछ भी हो मगर यहां से ज़िन्दगी अपने रंग बदलने लगती है, कुछ कड़वाहटों का सामना होता है तो कुछ हसीन ख़्वाब रात की तारीकियों में मन को गुदगुदाते भी हैं... बच्पन की सारी शौख़ी और सारी चंचलता कहीं दूर चली जाती है, मासूम से चेहरे पर हमेशा फैली रहने वाली हंसी पंदरह सालों का लम्बा सफर तय करने में कहीं खो जाती है और उस की जगह आंखों में रंगीन शामों की धुंध और मुस्तकबिल की धुंधली तसवीर समा जाती है...हां शायद बचपन के बाद आने वाले लम्हे कुछ इसी तरह करवट लेते हैं।

Thursday, 8 October 2009

गरीबों का लेखक- मुंशी प्रेम चंद

मुंशी प्रेम चंद की पुण्यतिथि पर खास

अगर हिनदुसतान को ताज महल जैसी हसीन इमारत पर फ़ख़्र है, कुतुब मीनार की बलंदियों पर नाज़ है और लाल किला की मजबूती पर उस की छाती चौड़ी हो जाती है तो वहीं रबिन्द्र नाथ टैगोर की कविताओं, बुल्बुले हिन्द सरोजनी नाइडो की कुर्बानियों और मुंशी प्रेम चंद जैसे महान लेखक के कारनामों को याद करके उसकी आंखों में चमक आ जाती है।
एक गरीब कलर्क की कुटिया में आंखें खोलने वाले धनपत राय ने शायद अपने ख़्वाबों में भी ना सोचा हो कि वह एक दिन हिनदुस्तान का नाम रोशन करेगा और अदब की दुनिया में प्रेम चंद बन कर दूसरों की रहनुमाई करेगा। 8-10 साल तक फारसी की पढ़ाई करने के बाद जब अंग्रेज़ी पढ़ाई का सिलसिला शुरू हुआ 15 साल की उम्र में शादी हो गई और एक साल के बाद पिता का देहान्ता हो गया। यानी एक दरवाज़े से खुशियों ने आना शुरू किया तो दुनिया के ग़मों ने खिड़कियों पर पहरा ड़ाल दिया।
15 साल के कमज़ोर कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बोझ आ पड़ा और फिर लड़कों को टियुशन पढ़ा कर घर का बोझ संभला, शिक्षा विभाग में नौकरी मिली औऱ इसी दौरान प्रेम चंद ग्रेजुएट हो गए।
छोटी उम्र में कहानियों से प्रेम ने प्रेम चंद को कहानियां लिखने का हौसला बख़्शा और 1901 में ज़माना नाम की पत्रिका में कहानी लिखकर अपना सफर शुरू किया। छोटी छोटी कहानियों से शुरू होने वाला ये सफर अफसानों से गुज़रता हुआ नाविलों की सूरत इख़तियार कर गया और प्रेम चंद की कलम ने रूठी रानी, कृष्णा, वरदान, प्रतिज्ञा से चलते चलते प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमी, कर्मभूमी, गोदान और गबन जैसी नाविलें लिख कर दुनिया को चौंका दिया।
इस में कोइ शक नहीं गंगा जमुनी तहज़ीब की सरज़मीन बनारस से 6 मील दूर पर बसे लम्ही गांव में एक मामूली किसान के घर 31 जुलाई 1880 में जन्म लेने वाले प्रेम चंद जिन्दगी भर गांव और दिहातों में बसने वाले, झोंपडों में रातें बसर करने वालों और खेत की धूल को अपने पसीने से तर कर के रोटी खाने वालों की आवाज़ रहे।
प्रेम चंद ने जिन्दगी भर कहानियों और उपन्यासों को अपना हमराह बनाए रखा और हर कहानी में ज़मीन और खास कर हिनदुस्तान से जुड़ी परेशानियों और गरीब जनता के मुद्दों को उठाया। हकीकत पसंदी के इस अंदाज़ ने मुंशी प्रेम चंद को वो मक़बूलियत दी कि पूरा हिनदुस्तान उनका दीवाना बन गया।
चिलचिलाती धूप में ज़ख़्मी परिंदे की तरह सफर करने के हौसले प्रेम चंद को बहुत ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया। मगर जिंदगी की तमाम खुशियों और मध्यम वर्ग के हर दुख़ दर्द को अलफ़ाज़ के रंगों में ढालने वाला कलम का ये सिपाही 8 अकटूबर 1936 में हज़ारों आंखों को आंसुओं में तर करता हुआ एक ना मालूम देस की तरफ सिधार गया


Monday, 5 October 2009

शब्दों का जादूगर-मजरूह सुल्तानपुरी

अगर हिन्दुस्तानी सिनेमा को राजकपूर की अदाकारी ने दीवाना बनाया था, रफी के सुरों ने नचाया था, नौशाद की धुनों ने एक नई दुनिया में खो जाने पर मजबूर किया था, साहिर के लिखे गानों नें जिन्दगी की तल्ख़ सच्चाईयों से सामना कराया था तो मजरूह सुलतानपूरी के गीतों ने कभी आंखों से बरसात करवाई तो कभी उदास आंखों में खुशियों की लहर दौड़ा दी।
जिन्दगी के हर फलसफा और जिन्दगी के हर रंग रूप को करीब चार दहाईयों तक अपने गानों में पेश करने वाले मजरूह सुलतानपूरी का जन्म एक पुलिस वाले के घर हुआ था जिसने उन्हें आला तालीम दिलाई, उन्हें एक महान आदमी के रूप में देखने के ख्वाब पाले। मगर शायरी से मुहब्बत करने वाले मजरूह ने डाक्टरी के पेशे को छोड़ कर शायरी की दुनिया में कदम रख दिया। यहां जो मुहब्बतें उनको मिलीं उस ने इन्हें ये मैदान ना छोडने पर मजबूर कर दिया। और फिर शायरी का ये सफर पूरे शान से शुरू हो गया। जब तवज्जह का मरकज़ शायरी बनी तो जिगर मुरादाबादी जैसे अज़ीम शायर उनके उस्ताद के रूप में सामने आए। इस दौरान मुशायरों में आने जाने का सिलसिला चलता रहा।
1945 में भी ऐसे ही एक मुशायरे में शिरकत के लिए मजरूह मुम्बई गए। मुम्बई में होने वाले मुशायरे उस वक्त खास अहमियत इस वजह से रखते थे क्योंकि वहां फिल्मी दुनिया की कई बडी हस्तियां तशरीफ रखती थी और कई दफा किसी शायर का कलाम पसंद आ जाता तो उस की जिन्दगी बदल ही जाती थी। यही हुआ मजरूह के साथ भी, उस मुशायरे में फिल्मसाज़ और हिदायतकार ए आर कारदार को मजरूह ने बहुत मुतअस्सिर किया जिस के चलते उन्होंने मजरूह को अपनी फिल्म में गाना लिखने की पेशकश की मगर मजरूह ने इनकार कर दिया। लेकिन जिगर मुरादाबादी के समझाने के बाद उन्हों ने गाने लिखने के लिए अपनी रज़ामनदी ज़ाहिर कर दी। संगीतकार नौशाद ने उन्हें एक धुन सुनाई और उस पर गाना लिखने को कहा, उस पर मजरूह की कलम ने जो गाना लिखा उस का मुखडा था कि उनके गेसू बिखरे बादल आए झूम के। मजरूह के लिखने का ये वह अंदाज़ था जिसने नौशाद जैसे अज़ीम संगीतकार को अपना दीवाना बना लिया था।
1946 में फिल्म शाहजहां में जब पहली बार उन्हें अपने हुनर का जलवा दिखाने का मौका मिला तो वो संगीत प्रेमियों के दिलों पर पूरी तरह छा गए। इस फिल्म में मजरूह ने कई तरह के गाने लिखे। कर लीजिए चल कर मेरी जन्नत के नजारे और जब दिल ही टूट गया तो जी कर ही क्या करेंगे जैसे गानों ने इस फिल्म को कामियाबी की मंजिलों तक पहुंचाया और खुद मजरूह को भी एक नई पहचान दे गए।
1949 में उन्हें एक बडा ब्रेक फिल्म अंदाज़ में मिला और उस फिल्म में नौशाद की धुनों पर जिस तरह के गाने मजरूह ने लिखे वह दिल के अंदर घर कर जाने वाले थे। हम आज कहीं दिल खो बैठे, कोई मेरे दिल में खुशी बन के आया, झूम झूम के नाचो आज, टूटे ना टूटे साथ हमारा, उठाए जा उनके सितम और डर ना मुहब्बत कर ले जैसे गानों में मजरूह ने जिस बेबाक अंदाज़ से जिन्दगी और मुहब्बत को पेश किया वह काबिले तारीफ था। इस फिल्म के बाद मजरूह के पास काम की कमी नही रही और वह सारे संगीतकारों के चहेते बन गए।
मजरूह सुलतानपूरी ने हर दौर के महान संगीतकारों के साथ काम किया। नौशाद,ओ पी नय्यर और आर डी बर्मन से लेकर जतिन ललित और ए आर रहमान जैसे संगीतकारों की धुनों पर मजरूह के गानों ने खूब जलवे बिखेरे।
शाहजहां, अंदाज, आरज़ू, आर पार, पेईंग गेस्ट, नौ दो गयारह, दिल्ली का ठग, काला पानी, सुजाता, बाम्बे का बाबू, बात एक रात की, ममता, तीसरी मंज़िल, अभिमान, यादों की बारात, हम किसी से कम नहीं, कयामत से कयामत तक, जो जीता वही सिकंदर और खामोशी जैसी यादगार फिल्मों में मजरूह ने के एल सहगल से राकुमार और आमिर खान जैसे सुपरस्टारों के लिए गाने लिखें है।
मजरूह ने हर तरह के गाने लिखे। तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है, रात कली इक ख्वाब में आई, ओ मेरे दिल के चैन, चलो सजना जहां तक घटा चले, चुरा लिया है तुम ने जो दिल को, छोड दो आंचल ज़माना क्या कहे गा, आजा पिया तोहे प्यार दूं, अब तो है तुमसे हर खुशी अपनी, बचना ऐ हसीनों और बाहों के दरमियां जैसे गानों में अगर देखा जाए तो मुहब्बत के हर पल का मज़ा रखा है। बेचैनी, तन्हाई, तड़प, मिलन और चंचलता का पूरा रंग इन गानों में देखने को मिलता है। यही नहीं पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा और रूक जाना नहीं तू कहीं हार के जैसे गाने भी मजरूह की कलम से ही निकले हुऐ शाहकार हैं जिसने नौजवानों के अंदर हौसले को जन्म दिया है। एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल जैसे गानों से मजरूह की महान्ता का बडे अच्छे अंदाज़ से पता लगाया जा सकता है।
पूरी दुनिया ने मजरूह की सलाहियतों का लोहा माना था। उन पर अवॉर्डों की बारिश हुई थी। दादा साहब फालके अवॉर्ड तक उनकी झूली में आ चुके हैं। इसके अलावा और कई अवॉर्डों से उन्हें सम्मानित किया गया। फिल्म दोस्ती के सुपर हिट गीत चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड भी दिया गया था।
चार दहाईयों तक अपनी शायरी और अपनी गीतों से संगीत प्रेमियों के दिलों पर दस्तक देने वाले मजरूह ने करीब तीन हज़ार से ज्यादा गाने लिखे।

Thursday, 1 October 2009

कहां है गांधी के सपनों का हिन्दुस्तान?

एक ऐसा इंसान जिसने हिन्दुस्तान को एक महान देश बनाने के लिए अपने जान की कुर्बानी दी आज उस का जन्म दिन मनाया जा रहा है मगर उसके सपनों का भारत जिस के लिए उसने कुर्बानी दी उसका वजूद खोता नज़र आ रहा।
गांधी एक ऐसा नाम है जिसने दुनिया में सिर्फ मोहनचंद के रूप में ही ज़िन्दगी नही गुज़ारी बल्कि उस ने पूरी दुनिया में हिन्दुसतान और उस की तहज़ीब को पेश किया। अपने उसूलों और सिद्धान्तों से गांधी ने पूरी दुनिया को अपना एहतराम करने पर मजबूर कर दिया। दुनिया ने यहां तक माना था कि गांधी के उसूल कामियाबी में मददगार हैं। एक अच्छा इंसान होने के साथ साथ गरीबों और समाज के हर तबके से बराबर जुड़े रहने वाले मोहनदास करमचंद गांधी ने पूरे हिन्दुसतान को साथ लेकर हिन्दुसतान की आज़ादी के सपने देखे। हिन्दु, मुसिलम, सिख और ईसाई के अलावा पूरे हिन्दुसतान को साथ लेकर चलने वाले बापू को अपना मकसद हासिल करने की राह में हज़ारों मुशकिलें आईं। आज़ादी के लिए बार-बार जेलों में जिंदगी गुज़ारने पर मजबूर होना पड़ा। पर बापू ने तो आज़ाद हिन्दुसतान का सपना देखा था। उसे महान भारत का ताज देना चाहा था। सियासत के गलत नजरियों से पाक कराने का सपना देखा था। तमाम तरह की गंदगियों से साफ भारत का ख्वाब देखा था। लेकिन वो जिंदगी ही क्या जिस में आदमी को सब कुछ हासिल हो जाए। कहा जाता है कि अकसर आदमी जो चाहता है नहीं मिलता, यही हुआ था गांधी जी के साथ भी उन्हों ने देश तो आज़ाद करवा दिया मगर इस के लिए जो सपने उन्होंने देखे थे वह पूरे ना हो सके। उनके वह सिद्धांत जो हिन्दुसतान को ऊंचाईयों तक ले जाने वाले थे वह भारत का बुरा चाहने वालों की आंखों में खटकने लगे और इस का नतीजा ये हुआ कि मुल्क आज़ाद होने के एक साल बाद उनका कत्ल कर दिया गया।
गांधी जी के देहान्त के बाद इस बात पर तो काफी शोर मचा की देश उन्ही के सिद्धानतों पर चलेगा मगर ऐसा हुआ नहीं। गांधी जी की सारी कुरबानियां तकरीबन बेकार ही साबित हुईं, उन्हों ने मुल्क को ज़रूर आज़ाद करवा दिया, यहां की जनता को आज़ादी की सुबह ज़रूर दिखला दी मगर जिस भारत की आरज़ू थी शायद वह आज तक नहीं बन सका।
इस के क्या असबाब हैं? अगर इस सवाल का जवाब तलाश करने की कोशिश की जाए तो शायद ये अंदाज़ा लगाना ज़्यादा मुशकिल न होगा कि आज़ादी के बाद लोगों ने लिखने और बोलने के लिए तो गांधी के उसोलों को इस्तेमाल किया मगर जब कुछ करने की बात आई तो अपने उसूल बना ड़ाले, अपने हिसाब से कौम को रास्ता दिखाने की कोशिश करने लगे और इसी सूरत में फंस कर वह भारत को एक ऐसी तारीख़ दे गए जिस में लोगों का ख़ून बहा, दुलहनों की मांग सूनी हुई, सुहागनों की चूड़ियां टूटीं, बहनों की राखी का सहारा टूटा, माओं की गोद सूनी हुई और बच्चे बाप के कंधों से महरूम हुए। तारीख़ गवाह है कि बेबुनियाद उसोल ने हिन्दुस्तान को सोने की चिड़िया से एक खौफनाक सूरतेहाल में तबदील कर दिया।
गांधी जी का तो ये मानना था कि हिन्दुस्तान अगर तलवार के रास्ते को अपनाता है तो हो सकता है उसे फौरन कामियाबी मिल जाए लेकिन इस सूरत में तशद्दुद से भरा भारत मेरे दिल का टुकड़ा नही हो सकता, पूरी दुनिया को रास्ता दिखाने के लिए हिन्दुस्तान का यही मिशन होना चाहिए कि जो बात अख़लाकी तौर पर गलत है वो सियासी तौर पर भी गलत है। मगर आज की सूरतेहाल इस के बिलकुल मुखालिफ है। गांधी और उनके दौर के महान नेताऔं के बाद जिन नेताओं ने जन्म लिया उन्हों ने तलवार के रास्ते से भारत हासिल करने की कोशिश की। क्या सिखों को कत्लेआम इस बात का सबूत नहीं, क्या अयोध्या में हुए बाबरी इंहेदाम के बाद बहने वाले ख़ून इसी बात की गवाही नहीं दे रहे, क्या गुजरात में मोदी और उसके कारकुनों के जरिए ढाए जाने वाले मज़ालिम यही दास्तान नहीं बयान कर रहे। क्या 2003 में अहमदाबाद से लेकर गुजरात के बड़े शहरों की फज़ाओं में कमसिन लड़कियों की चीख़ें और अपनी इज़्ज़त की हिफाज़त के लिए गूंजने वाली सदाऐं इस का सुबूत नहीं हैं। अख़लाक और किरदार की सारी हदों को तोड कर जो माहौल पैदा किया गया था शायद अगर आज गांधी जी भी होते तो ना जीने की दुआऐं करते। आज के इस दौर में अख़लाक वो किरदार सियासी मैदान में कोई माना नहीं रखता।
तकरीबन चार पांच दशक पहले फिल्मी दुनिया में आला ख़ानदान की लडकियां कम ही नज़र आती थी। अकसर वो औरतें जो चकलों और मुजरों पर शाइकीन का दिल लुभाती थी वही बड़े पर्दे पर भी नज़र आती थी। मगर आज वो हालात ख़त्म हो गए, सोचने के अंदाज़ बदल गए, आज हर बड़े बाप की बेटी अदाकारा बनने के ख़्वाब संजोती है। ठीक इसी तरह पहले कौम की ख़िदमत करने के जज़्बे से लोग सियासत में कदम रखते थे। मगर आज लोग अपनी बिज़नेस की दुकान चमकाने के लिए सियासत में आते हैं। उन के यहां अख़लाक की कोई अहमियत है ना किरदार कोई माना रखता है। जिस में उनका फायदा हो वह चीज़ ठीक होती है चाहे उस से तहज़ीब का ख़ून हो या समाज़ की लानत का सामना करना पड़े।
सियासत के ठेकेदारों ने आज सियासत को नया अंदाज़ दे दिया है, जिस का नतीजा साफ देखने को मिल रहा है। हर कोई सहमा हुआ है, ख़ौफ का साया हर किसी की आंख़ों के सामने लहरा रहा है। आज हिन्दुस्तानियों ने ख़ून और लहू के ऐसे मंज़र देख लिए है कि इन के दिल ख़ौफ से कांप रहे हैं। पुरसकून और अमन व अमान से लबरेज़ भारत का सपना देख कर उसे आज़ादी दिलाने की राह में मौत को गले लगाने वाले शहीदों की रूहें आज शर्मसार हो रही हैं।
आज सब कुछ बदल चुका है। जहां गांधी ने अपने आप को समाज के सबसे निचले दरजे के लोगों के लिए वक्फ़ किया वहीं आज के सियासत दान कारपोरेट सेक्टर के बड़े बड़े लोगों के तलवे चाटने पर खुश हैं। जहां गांधी जी हर वक्त लोगों के साथ बगैर सिक्योरिटी के घूमते थे, वहीं आज के भारती नेता 50 से ज्यादा पुलिस वालों को साथ लेकर चलते हैं। जहां गांधी रेल के जनरल डिब्बों में जिंदगी भर सफर करते रहे वहीं आज के नेता एसी से नीचे की सोचते तक नहीं। कुछ लोगों ने इकोनोमी क्लास में सफ़र करने का हौसला तो दिखाया है मगर कब तक यह होगा? शायद पहली और आख़िरी बार चेक करने के लिए सफर कर रहे हैं और इस के बाद दोबारा ऐसी हिम्मत न दिखा सकें। क्योंकि शशि थरूर जैसे पढ़े लिखे और महान नेता जब इकोनमी क्लास को भेड़ बकरियों की क्लास बताऐंगे तो कौन उस में सफर करेगा। सोचना तो यही है कि पांच सितारा होटलों मे जिंदगी गुजारने वाले ये नेता गांधी जी का सपना कैसे पूरा करेंगे।

Wednesday, 30 September 2009

मन्ना डे जादुई आवाज़ का बेताज बादशाह

ये कोई उस वक्त की बात है जब पूरी दुनिया रफी, लता, मुकेश और तलअत महमूद के गाने सुनकर उनके सुरों पर झूमती थी, उस वक्त इन महान गायकों में से एक महान गायक जिस ने अपनी आवाज़ की दिलफरेबीयों से पूरी दुनिया को मदहोश कर रखा था वह ख़ुद मन्ना ड़े सुरों पर थिरकता था। जी हां संगीत प्रेमियों के दिल की हर धडकन में धडकने वाली आवाज़ के मालिक मो. रफी के दिलों में मन्ना डे के गाने बजते थे। इस का इज़हार रफी ने कुछ इस तरह किया था कि आप हमारे गाने सुनते हो और में सिर्फ मन्ना डे यानी प्रबोधचन्द्र डे की आवाज़ पर झूमता रहता हूं। उन के इसी आवाज़ और फिल्मी दुनिया को दिए योगदान का ही नतीजा है कि आज उन्हें फिल्म जगत का सब से बड़ा अवॉर्ड दादा साहब फाल्के पुरूस्कार देने का एलान किया गया है।
सीधे साधे और आम आदमियों में खोए रहने वाले मन्ना दा को लगाव था कुश्ती और मुक्केबाज़ी से, मगर चाचा का संगीत प्रेम दिलों में घर कर गया और मन्ना दा भी सुरों का बाग बनाने का सपना देखने लगे। उस्ताद दाबिर ख़ां की हिदायत में संगीत सीखना शुरू किया और आगे चल कर उस्ताद अमान अली खां और उस्ताद अब्दुल रहमान खां की परवरिश ने उन्हें कुन्दन बना दिया।
23 साल की उम्र में मन्ना डे ने अपनी आवाज़ का जादू जगाने के लिऐ मुम्बई जाने का फैसला किया और चाचा के हमराह मायानगरी पहुंच गए। उनके सहायक बनकर काम करना शुरू किया और कुछ दिनों तक सचिन देव बर्मन के भी सहायक रहे।
1943 में फिल्म तमन्ना से जब मन्ना दा ने अपना कैरियर शुरू किया था तब फिल्मी दुनिया उनके लिए अजनबी थी, आगे क्या होगा इसका कोई अंदाज़ा ना था। मगर जब उनकी आवाज़ लोगों के कानों तक पहुंचने में कामयाब हुई तो वह हर संगीतकार के चहेते बन गए। तमन्ना में उनकी आवाज़ में गाया जाने वाला हिट हुआ और उन की आवाज़ को एक पहचान मिल गई। मन्ना डे के लिऐ ये अच्छा शगुन साबित हुआ और 1950 में रिलीज़ होने वाली फिल्म मशाल में उनके जरिये गाये जाने वाले गाने उपर गगन विशाल ने इनकी पहचान में चार चांद लगा दिए।
एक ऐसे वक्त में जब हिन्दुस्तान में क्लासिकी संगीत दम तोड़ रही थी और उस की जगह पॉप संगीत अपने पैर जमा रही थी उस वक्त मन्ना डे ने क्लासिकी संगीत का सहारा बनकर उसे दोबारा जिन्दा किया। इस में कोई शक नहीं की मन्ना डे एक पुरकशिश आवाज़ के मालिक थे मगर ये भी उतनी ही बड़ी सच्चाई है कि वह एक सुलझे हुऐ आदमी है, वह अपने काम के तईं ईमानदार थे और उन्हों ने किसी खास बैनर के साथ बंधकर काम नहीं किया। एक खुद्दार और महान आदमी की तरह जिंदगी की सच्चाईयों को तसलीम किया और ख़ुद आगे बढ़ते रहे। मगर शायद उनका ऐसा करना उनके हक में फायदेमंद ना साबित हुआ। उन्हें बड़े बैनर की फिल्मों में काम करने का मौका बहुत कम मिला। मगर वो आवाज़ ही क्या जिसका जादू सर चढ़कर ना बोले, और वह सुर ही क्या जो राही के कदम ना रोक दे, मन्ना डे की आवाज़ में एसी मिठास थी की उनके पास काम की कमी नहीं रही और उन्होंने बी और सी ग्रेड की फिल्मों में ही अपना अकसर गाना गा कर अपनी एक अलग पहचान बना ली। आज मन्ना के इतने चाहने वाले हैं जिसके लिए बड़े बड़े कलाकार तरस्ते रहते हैं।
तमन्ना से शुरू होने वाला ये सफर बड़ी शान से चलता रहा। इस बीच ऐ मेरी जोहरा जबीं.., ऐ भाई ज़रा देख के चलो.., यारी है ईमान मेरा यार.., मुड मुड के ना देख.., ये इश्क इश्क है.., ये रात भीगी-भीगी.., कस्मे वादे प्यार वफा सब.., लागा चुनरी में दाग.., जिंदगी कैसी है पहली हाय.., प्यार हुआ इकरार हुआ.., ऐ मेरी जोहरां जबी.., ऐ मेरे प्यारे वतन.., पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई.., इक चतुर नार करके सिंगार.., तू प्यार का सागर है.., पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई.., जैसे कई सदाबहार गाने मन्ना डे ने गाए हैं। इन सारे गानों में संगीत प्रेमियों को अलग अलग मन्ना डे देखने को मिल सकते हैं। इस की वजह कुछ और नही बल्कि उनकी मधभरी आवाज़ है।

Sunday, 27 September 2009

मेरी आवाज़ ही पहचान है मेरी

कल एक ऐसी आवाज़ की मलिका का जन्म दिन है जिस के सुरों पर पूरी दुनिया झूमती है। जी हां कल लता मंगेशकर 80 साल की हो जाएंगी, मगर ये भी एक सच्चाई है की लता जी की आवाज़ से उन की उम्र का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है। 13 साल की उम्र से गाने का सफ़र शुरू करने वाली लता की आवाज़ में वो जादू आज भी उसी हालत में बरकरार है जैसा शुरूआती दिनों में था। मंदिरों में बजती घंटियों के जैसा जादू लिये लता की आवाज़ ने कई नसलों को अपना दीवाना बनाया। उन की आवाज़ की खनक आज भी सीधे दिल की गहराईओं में उतर जाती है।

28 सितम्बर 1929 को इन्दोर में गायक पिता दिनानाथ मंगेशकर शास्त्रीय के घर पैदा होने वाली लता ने अपना पहला गाना मराठी फिल्म किटी हसाल (1942) में गाया था। पिता को लता का फिल्मों में गाना नापसंद था इसलिए यह गाना फिल्म से हटा लिया गया। मगर जब पिता का निधन होगया और जिंदगी के सर से बाप का सहारा उठ गया तो लता ने घर चलाने के लिए फ़िल्मो मे काम करना शुरू कर दिया। मजबूरियों ने आवाज़ और सुरों की इस मलिका को अदाकारा बना दिया। हालाँकि अदाकारी मे वे सफल नही हो सकीं। मगर तकदीर तो उन्हें बुल्बुले हिन्द बनाने वाली थी, उन का जादू पूरी दुनिया के सर चढ़ कर बोलने के लिए था और शायद यही वजह है कि उन्हें अदाकारी के मैदान में नाकामियों का सामना करना पड़ा।

शुरू के कुछ दिनों में तो लता की आवाज़ के चर्चे तो हुए मगर उन्हें वह कामियाबी ना मिली जिसकी उनको तलाश थी। फिर फिल्म महल लता की जिंदगी में आई और लता को इतनी उंचाई पर पहुंचा दिया जहां पहुंचने का ख्वाब तो हर कलाकार देखता है मगर कम ही लोग वहां तक पहुंच पाते है। अपने वक्त की लाजवाब अदाकारा मधुबाला पर फिल्माया गया उनका गाना "आयेगा आने वाला" सुपर डुपर हिट रहा। यहां लता की जिंदगी का एक दौर ख़्तम होता है और फिर शुरू होता है कामियाबियों का ना ख़्तम होने वाला सिलसिला। 1949 में 'बरसात', 'दुलारी', 'महल' और 'अंदाज़' के गानों ने धूम मचाई और लता सब की पसंद बन गईं। उस वक्त शमशाद बेग़म, नूरजहाँ और ज़ोहराबाई अंबालेवाली जैसी वज़नदार आवाज़ वाली गायिकाओं का राज चलता था मगर लता के हिम्मत और हौसले ने उनको एक अलग पहचान दी और दुनिया ने ये मान लिया की ये नई आवाज़ दूर तक जाने वाली है।

ये एक हकीकत है कि 1950 के दशक में लता का सिक्का बॉलीवुड मे जम चुका था और वह किसी भी संगीतकार के लिए कामयाबी हासिल करने की कुंजी बन गईं थी। इस के बाद लता ने कभी पीछे मुड़कर नही देखा।

लता मंगेशकर अब तक 20 से अधिक भाषाओं मे 30000 से अधिक गाने गा चुकी हैं।

भजन, ग़ज़ल, क़व्वाली शास्त्रीय संगीत हो या फिर आम फ़िल्मी गाने लता ने सबको जिस महारत से गाया वह उनके एक महान फनकार होने की दलील है।

यही वजह है कि आज उनके पास अवॉर्ड की भरमार है। जहां फ़िल्म जगत का सबसे बड़ा सम्मान दादा साहब फ़ाल्के अवार्ड उनके नाम है वहीं देश का सबसे बड़ा सम्मान 'भारत रत्न' भी उनकी झोली में आ चुका है।

हमेशा नंगे पाँव गाना गाने वाली लता ने बहुत खूबसूरत गीत गाए है। आ जा अब तो आ जा, आ जाओ तडपते हैं अरमां, आ मेरी जान मैं तुझ में अपनी जान रख दूँ , ऐ मालिक तेरे बंदे हम, ऐसे हो हमारे करम, आईना वो ही रहता हैं, आज दिल पे कोई जोर चलता नहीं, आज कल पाँव जमींपर नहीं पडते मेरे, कांटों से खिंच के ये आंचल, तोड के बंधन बांधी पायल, आज सोचा तो आँसू भर आए, आजा पिया तोहे प्यार दूँ , आ जा रे परदेसी, अखियों को रहने दे,अखियों के आसपास, आप का खत मिला, आप का शुक्रिया, आप मुझे अच्छे लगने लगे, आप यूँ फासलों से गुजरते रहे, दिल पे कदमों की आवाज आती रही, दिल दीवाना बिन सजना के माने ना और जिया जले जां जले जैसे गानों में उन्हों ने मधुबाला से लेकर माधुरी और काजोल तक तमाम ही अदाकाराओं को अपनी आवाज़ दी और उन्हें बलंदियां छूने मे मदद की।

Saturday, 26 September 2009

सदाबहार अभिनेता देव आनंद

हिन्दुसतानी फिल्मी दुनिया में हजारों चेहरों ने अब तक जन्म लिया, अपनी अदाओं और अपने जलवों से लोगों को लुभाया, एक वक्त तक परदे पर राज भी किया मगर कामियाबी का ये सफर ज्यादा देर तक कायम न रह सका और सभी एक खास वक्त के बाद मुरझाए गुलाब की तरह बेमाना हो कर रह गए।

इन में कुछ लोग ऐसे हैं जिनके बहारों के गुलशन में कभी पतझड़ नही आया और उन की कामयाबी के फूल मुरझाए नहीं। उन्ही लोगों मे से एक पंजाब के गुरदासपुर कस्बे में 26 सितम्बर 1923 को जन्मे देव आनंद भी है। लाहौर कालेज से इंगलिश से ग्रेजुऐशन करने वाले देव का बचपन परेशानियों से घिरा रहा। एक वकील और आजादी के लिए लडने वाले पिशोरीमल के घर पैदा होने वाले देव ने रद्दी की दुकान से जब बाबूराव पटेल द्वारा सम्पादित फिल्म इंडिया के पुराने अंक पढ़े तो उस की आंखों ने फिल्मों में काम करने का सपना देख डाला, और वह मायानगरी मुम्बई के सफर पर निकल पडा।

तीस रूपए जेब में ले कर पिता के मुंबई जाकर काम न करने की सलाह के विपरीत देव अपने भाई चेतन के साथ फ्रंटियर मेल से 1943 में बंबई पहुँच गया। देव ने ये सपने भी ना सोचा होगा की कामियाबी इतनी जल्दी उसके कदम चूमेगी मगर ये तीस रुपए रंग लाए और जाएँ तो जाएँ कहाँ का राग अलापने वाले देव आनंदको मायानगरी मुम्बई में आशियाना मिल गया।

सन 1946 में हम एक हैं में पहली बार देव आनंदको काम करने का मौका मिला मगर उनकी सबसे पहली कामियाब फिल्म जिद्दी साबित हुई। जिद्दी ने देव आनंदको नई ऊंचाइयां अता कीं। यहां से जो सिलसिला शुरू हुआ वह दूर तक देव के हक में रहा और एक वक्त ऐसा आया जब देव आनंदहिन्दुसतानी फिल्मी दुनिया के उस्ताद कलाकारों में शुमार किए जाने लगे।

देव आनंदने लव एट टाइम्स स्क्वैर, हम नौजवान, देश परदेस, तेरे मेरे सपने, हरे रामा हरे कृष्णा, जॉनी मेरा नाम, ज्वैलथीफ, हम दोनों, माया, रूप की रानी चोरों का राजा, बम्बई का बाबू, लव मैरिज, काला पानी, दुश्मन, टैक्सी ड्राइवर, नौ दो ग्यारह, पेइंग गेस्ट, सी आई डी, फंटूश, बाज़ी बेमिसाल फिल्मों को अपनी अदाकारी के जरिए कामियाब बनाया। यही नहीं उन्होंने बतौर लेखक 1993 में प्यार का तराना नामी फिल्म की। इस के अलावा बतौर निर्माता 1998 में मैं सोलह बरस की और 1993 में प्यार का तराना लेकर सामने आऐ। यही नही बतौर निर्देशक लव एट टाइम्स स्क्वैर, मैं सोलह बरस की, गैंगस्टर और हम नौजवान जैसी फिल्में भी की।

देव आनंदअपनी खास स्टाइल के लिए जाने जाते हैं। उन्हों ने अपने किरदारों में नौजवानों की उमंगों, तरंगों और चंचलता को बहुत ही खूबसूरत अंदाज से पेश किया है।

देव आनंदआदर्शवाद और व्यवहारवाद में नहीं उलझते और न ही उन का किरदार प्रेम की नाकामियों से दो-चार होता है। अपनी अदाकाराओं के छेड़खानी, शरारत और फ्लर्ट करने वाला आम नौजवान देव का नायक रहा। देव ने अपने किरदारों में जवानी के हर मौसम का लुत्फ लिया। जवानी के तमाम दबे-कुचले अरमानों को पूरे रस के साथ जिया और नौजवानों के चहेते बन गए।

नौजवानों के जज़बात को परदे पर पेश करने वाले खूबसूरत देव हमेशा ही खूबसूरत लडकियों से घिरे रहे। हज़ारों दिलों की धडकन रहे देव हसीनाओं का सपना बन चुके थे। मगर देव फिल्मी दुनिया की रीत ने देव को भी अपने चपेट में ले लिया और वह भी मशहूर अदाकारा सुरैया के हुस्न के दीवाने बन गए। यही नहीं वह भी देव की दीवानी हो चुकी थी। 1948 में बनी ‘विद्या’ फिल्म की नायिका सुरैया थी। इसके सेट पर ही दोनों में प्यार हुआ। 1951 तक दोनों ने सात फिल्मों में साथ काम किया। मगर अफसोस दोनों के साथ रहने का ख्वाब पूरा ना हो सका। देव ने अपने टूटे प्यार का इजहार कई बार किया है। बाद में ‘टैक्सी ड्राइवर’ की हीरोइन मोना याने कल्पना कार्तिक से फिल्म के सेट पर शादी हो गई। मगर सुरैया ने देव के अलावा किसी और को गवारा ना किया।

देव आनंदको उनकी बेहतरीन अदाकारी के लिए कई पुरस्कार मिले। 1967 में फिल्म गाइड के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार और 1959 में फिल्म काला पानी

के लिए एक बार फिर फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला। देव आनंद को सन 2001 में भारत सरकार ने कला क्षेत्र में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया था।