
हर रात सोने से पहले
कलम उठाता हूँ
सोचता हूँ कुछ लिखों
कापी के सादे पन्नों पर
कुछ रक़म करू
कुछ पल, कुछ यादें
कुछ लोग, कुछ बातें
कुछ दर्द, कुछ आहें
कुछ आंसू , कुछ मुस्कुराहटें
कुछ तड़प, कुछ सुकून
कुछ कसक , कुछ राहत
लेकिन
जब लिखने लगता हूँ
कलम तुम्हारे सिवा
कुछ लिखता ही नही
जेहन को को तुम्हारे सिवा
कुछ सूझता ही नही
यादों में तुम्हारी तुम्हारी याद के सिवा
कोई याद बाक़ी ही नही रहती
दिल की हर धड़कन
तुम्हारा ही नाम लेकर धड़कने लगती है
आँख तुम्हारी सूरत के सिवा
कोई चेहरा दिखलाती ही नही
तनहा बिस्तर की हर करवट
तुम्हारे साथ बीते हसीं दिनों को सोचने पर मजबूर कर देती है
मैं लाख चाहूं की तुम्हारे सिवा
कुछ और लिखो
जिस में तुम कहीं न हो
तुम्हारा कोई ज़िक्र न हो
पर मैं नाकाम रहता हूँ
शायद मेरी ज़िन्दगी का हर लम्हा
तुम्हारा है
तभी तो
कलम , कागज़ , सियाही
हाथ , आँख , तन्हाई
सब मेरा साथ छोड़ देते हैं
8 comments:
sunder khyaal hai
कलम , कागज़ , सियाही
हाथ , आँख , तन्हाई
सब मेरा साथ छोड़ देते हैं
बहुत सुन्दर लिखा है , सब मेरा साथ छोड़ देते हैं , मगर उसका ख्याल तो साथ देता है ये सब उसके साथ तो ईमानदार हैं ?
सुन्दर एह्सास॥
bahut hi sundar ehasas hai .......kya kahe .......bahut badhiya
wah...kya blog hain...
akshar aur rekhayen dono khoobsurat hai...
बहुत उम्दा!
बहुत खूब लिखा है.जैसे अपने जज़्बात उतार दिए हों ...बधाई
bohot hi sundar ehsas hai ....socha tha kabit parhenge par yeh to mere dill ke alfaj bol pare...
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