Pages

Monday, 9 August 2010

जब हम तन्हा तन्हा


तुम्हें कुछ सुनाना चाहता हूं

कुछ बातें, कुछ यादें

उन दिनों की

जब हम मिले नहीं थे

मैं ने तुम को देखा था

दूर सितारों की बज़्म में

चमकता हुआ, बिलकुल चांद जैसे

तुम्हें ढ़ूंढता था मैं

जब हम मिले नहीं थे

फूलों की ख़ुश्बुओं में

सर्दी की गुनगुनाती धूप में

गर्मी की बदन जलाती तेज़ हवाओं में

रिम झिम करती झूम कर आने वाली घटाओं में

मैं तुम्हें ढ़ूंढता था

जब हम मिले नहीं थे

रेतीले सहराओं में

कुहसारों और पहाड़ों में

मैं तुम्हें ढ़ूंढता था

जब हम मिले नहीं थे

दिलकश पाज़ेब की झंकारों में

मस्त आखों के मयखानों में

रेश्मी ज़ुल्फों और उल्झी लटों में

मैं तुम्हें ढ़ूंढता था

जब हम मिले नहीं थे

कोयलों की कू कू में

जंगल की तन्हाईओं में

अपनी सांसों की हरारत में

जलते लबों की प्यास में

मैं तुम्हें तलाश करता था

जब हम मिले नहीं थे

झील में उतरे चांद के अक्स में

क़तरा क़तरा टपकती ओस की बूंदों में

मैं तुम्हें ढ़ूंढता था

जब हम मिले नहीं थे

करवट करवट बदलती ज़िंदगी में

शाम को साथ चलने वाले साए में

मैं तुम्हें तलाश करता था

जब हम तन्हा तन्हा थे

Saturday, 24 July 2010

हर शाम तुम्हारी यादों का इक दीप जलाता रहता हूं


हर शाम तुम्हारी यादों का इक दीप जलाता रहता हूं
जो नग़मे तुम ने गाए थे उनको ही गाता रहता हूं
हर आन तुम्हारे मिलने की चाहत सी मचलती रहती है
हर लम्हा तेरी पलकों से सायों की ज़रूरत रहती है
फिर दूर कहीं वीराने में आवाज़ सुनाई देती है
चाहत के इस पागलपन में आवाज़ का पीछा करता हूं
हर शाम तुम्हारी चाहत का इक दीप जलाता रहता हूं

जाड़ों की ठिठुरती रातें हों या कजरारे बरसात के दिन
तुम साथ नहीं हो ऐसे में मैं क्या जानूं सौग़ात के दिन
दिल साथ तुम्हारे रहता है और सांसें चलती रहती हैं
एहसास सताता रहता है और धडकन धडकती रहती है
उम्मीद तड़प कर उठती है तुझे पाने को ज़िद करती है
चाहत के इस पागलपन में जाने क्या क्या करता हूं
हर शाम तुम्हारी यादों का इक दीप जलाता रहता हूं
जो नग़मे तुम ने गाए थे उनको ही गाता रहता हूं

Saturday, 17 July 2010

साथ फिर छोड़ गया वक्त का दरया बन कर


लम्हा लम्हा से बदलती हुई दुनिया में
चंद लम्हात की दे करके ख़ुशी छोड़ गया
एक तो वैसे ही ज़ख़्मों की कमी ना थी मुझे
दर्द कुछ अपने मेरे नाम किए, छोड़ गया
**********
वह मिला था मुझे एहसास का जुगनू बन कर
प्यार, इक़रार, वफ़ा, इश्क़ का पैकर बन कर
तुम मेरी जान हो हर ग़म मुझे अपना दे दो
मेरे हर दर्द चुरा लेता था वह इतना कह कर
बिखरी रहती थीं मेरी ज़ुल्फ़ें मेरे शाने पर
चूम लेता था मेरे लब उन्हें सुल्झा कर के
सुब्ह से शाम तलक साथ रहा करता था
और ख़्वाबों में भी आ जाता था दूल्हा बन कर
मेरी आंखों में नए रंग नए ख़्वाब भरे
साथ फिर छोड़ गया वक्त का दरया बन कर

Tuesday, 29 June 2010

तुमसा कुछ पाना चाहता हूं....


पाने को तो बहुत कुछ है

पर तुमसा कुछ पाना चाहता हूं

मुस्कुराते हुए लब

मस्ती में डूबी निगाहें

और गालों पर फैली थोड़ी सी लाली

पाने को तो बहुत कुछ है...

एक मुठ्ठी खुशियां

उम्र भर का तुम्हारा साथ

और एक क़तरा कामयाबी

पाने को तो बहुत कुछ है...

आवारा बादलों का एक टुकड़ा

चांद पर छोटा सा आशियां

और ज़िंदगी में बहुत कुछ कर गुज़रने का साहस

पाने को तो बहुत कुछ है

पर तुमसा कुछ पाना चाहता हूं....

Wednesday, 19 May 2010

गैर का ख़त मेरे नाम आया है


दफ्अतन तुम पे इक निगाह पड़ी
दिल की दुनिया को हार बैठे हम
ज़िंदगी थी मेरी अमानत-ए-गैर
उसको तुम पर ही हार बैठे हम
####
वक्त रूख़्सत हुआ मोहब्बत का
अब के नफरत का दौर आया है
ज़िंदगी दर्द-ए-दिल को पूजती है
तुम से बिछड़े तो याद आया है
अब के फिर ना मिलें ख़्यालों में
ख़्वाब में रो के हम ने पाया है
दर्द, आंसू, फरेब, दगा
ज़ख़्म अनगिनत तुम से खाया है
फिर वही भूल हो गई उससे
गैर का ख़त मेरे नाम आया है

Wednesday, 12 May 2010

मिलन की कोई रात आई ही नहीं


रात तारीकियों का पहरा था
मेरी खिड़की के दोनों दरवाज़े
हवा के तुन्द झोंकों से लड़ रहे थे
चंद जुगनू कभी चमक करके
तीरगी से भरी मेरी कोठरी में
खैरात में रौशनी के चंद टुकड़े उंडेल देते थे
सारी दुनिया थी अपने ख़्वाबों में
मैं तुम्हारे ख़्यालों में जागता ही रहा
वक्त की रफ्तार और दिल की धड़कनों की शिद्दत
आंकने की बेजा कोशिश कर रहा था
ज़ेहन के पुराने दफ्तर से
हर एक याद काग़ज़ पर उतरने को बज़िद थी
बिस्तर की सिलवटें कराह रही थीं
दर्द आंखों के रस्ते गालों को छू रहा था
तुम्हारी बातें कानों के परदे से बराबर टकरा रही थीं
हर याद बस तुम्हारे गीत गाने को कह रही थी
किसी को कुछ पता नहीं था
सब अपनी ही गा रहे थे
हां, वह सब अपनी जगह सही भी थे
महीना भी तो यही था
मई का
हां, यही तारीख भी थी
समां भी कुछ ऐसा ही था
हां, उस वक्त मैं तन्हा नहीं था
तुम्हारी बाहों के घेरे थे
तुम्हारी ज़ल्फों का साया था
तुम्हारे चेहरे की ख़ूबसूरत रौशनी थी
तुम्हारे बदन की ख़ुशबू से
पूरा कमरा भरा हुआ था
हां, ठीक उसी वक्त
हम ने ख़िडकी के बाहर
सितारे को टूटते देखा था
और फिर यक-ब-यक
हम दोनों ने दुआ के लिए हाथ उठा लिए थे
तुम्हें याद है हमने क्या मांगा था
मेरे ख़ुदा, हम कभी जुदा ना हों
मगर उस हसीन रात के बाद
मिलन की कोई रात आई ही नहीं

Thursday, 29 April 2010

untitled


इन दिनो कुछ अजीब आलम
प्यार की राह देखती हूं मैं

ज़िंदगी की तलाश में शब भर
चांद तारों से बातें करती हूं

प्यार, इक़रार और वफ़ा हमदम
सबके मानी तलाशती हूं मैं

ज़ेहन में उल्झनों का दफ़्तर है
रात आंखों में काटती हूं मैं

जिसको पाना था उसको पा तो गई
फिर भी तन्हाईयों में जीती हूं मैं

क्यों ये लगता है वह नहीं मेरा
सांस दर सांस जिस पे मरती हूं मैं

वह जो धड़कन में मेरी बसता है
शायद उसके लिए नहीं हूं मैं