कुछ बातें, कुछ यादें
उन दिनों की
जब हम मिले नहीं थे
मैं ने तुम को देखा था
दूर सितारों की बज़्म में
चमकता हुआ, बिलकुल चांद जैसे
तुम्हें ढ़ूंढता था मैं
जब हम मिले नहीं थे
फूलों की ख़ुश्बुओं में
सर्दी की गुनगुनाती धूप में
गर्मी की बदन जलाती तेज़ हवाओं में
रिम झिम करती झूम कर आने वाली घटाओं में
मैं तुम्हें ढ़ूंढता था
जब हम मिले नहीं थे
रेतीले सहराओं में
कुहसारों और पहाड़ों में
मैं तुम्हें ढ़ूंढता था
जब हम मिले नहीं थे
दिलकश पाज़ेब की झंकारों में
मस्त आखों के मयखानों में
रेश्मी ज़ुल्फों और उल्झी लटों में
मैं तुम्हें ढ़ूंढता था
जब हम मिले नहीं थे
कोयलों की कू कू में
जंगल की तन्हाईओं में
अपनी सांसों की हरारत में
जलते लबों की प्यास में
मैं तुम्हें तलाश करता था
जब हम मिले नहीं थे
झील में उतरे चांद के अक्स में
क़तरा क़तरा टपकती ओस की बूंदों में
मैं तुम्हें ढ़ूंढता था
जब हम मिले नहीं थे
करवट करवट बदलती ज़िंदगी में
शाम को साथ चलने वाले साए में
मैं तुम्हें तलाश करता था
जब हम तन्हा तन्हा थे







