
लम्हा लम्हा से बदलती हुई दुनिया में
चंद लम्हात की दे करके ख़ुशी छोड़ गया
एक तो वैसे ही ज़ख़्मों की कमी ना थी मुझे
दर्द कुछ अपने मेरे नाम किए, छोड़ गया
**********
वह मिला था मुझे एहसास का जुगनू बन कर
प्यार, इक़रार, वफ़ा, इश्क़ का पैकर बन कर
तुम मेरी जान हो हर ग़म मुझे अपना दे दो
मेरे हर दर्द चुरा लेता था वह इतना कह कर
बिखरी रहती थीं मेरी ज़ुल्फ़ें मेरे शाने पर
चूम लेता था मेरे लब उन्हें सुल्झा कर के
सुब्ह से शाम तलक साथ रहा करता था
और ख़्वाबों में भी आ जाता था दूल्हा बन कर
मेरी आंखों में नए रंग नए ख़्वाब भरे
साथ फिर छोड़ गया वक्त का दरया बन कर
18 comments:
वाह !! एक अलग अंदाज़ कि रचना ......बहुत खूब
बहुत ही सुंदर .... एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया ...
mere blog par swagat hai..
कहां से आया ये सॉरी...!
my new post......
एक तो वैसे ही ज़ख़्मों की कमी ना थी मुझे
दर्द कुछ अपने मेरे नाम किए, छोड़ गया
waah
bahut sunder
bahut dino baad itni acchi rachana ki hai tumne.
bahut bahut badhai.
बहुत ही बढ़िया
wah kya baat hai! bahut khoob likha hai, badhai
बहुत खूबसूरत रचना है,
दिल को छू गई।
बहुत खूबसूरत रचना है...!!
खूबसूरत ..
खुबसूरत अंदाज़......!!
खूबसूरत ग़ज़ल
विरह वेदना ,ाच्छी अभिव्यक्ति। शुभकामनायें
और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा। बस देखने की जरूरत है।
साथ फिर छोड़ गया वक्त का दरया बन कर
" इसी एक पंक्ति ने मन को छु लिया.."
regards
So beautiful and nice post.
Keep writing
www.alienshot.blogspot.com
"साथ फिर छोड़ गया वक्त का दरया बन कर"
आह....
सुब्ह से शाम तलक साथ रहा करता था
और ख़्वाबों में भी आ जाता था दूल्हा बन कर
मेरी आंखों में नए रंग नए ख़्वाब भरे
साथ फिर छोड़ गया वक्त का दरया बन कर...uffff bahut khoob.
Post a Comment