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Thursday, 16 July 2009

दिल कहता था चल उस से मिल ....

मैं याद तुझे ना करता पर दिल पर मेरा ज़ोर ना था
दो आंसू आँख से टपके थे और सामने तेरा चेहरा था


मैं तेरी क़सम पूरी करता ,बरसात ने पर वो काम किया
दो बूँदें बदन से लिपटी थी और सामने तेरा चेहरा था


मैं खुश था साहिल पर आकर मैं था और तन्हाई थी
इक हुस्न ने ली वो अंगडाई और सामने तेरा चेहरा था


वो हुस्न भी कुछ अलबेला था और मौसम का क्या हाल कहूं
दिल कहता था चल उस से मिल और सामने तेरा चेहरा था

Wednesday, 15 July 2009

इक चेहरे पर दिल मरता है


इक चेहरे पर दिल मरता है
बस याद उसे ही करता है


मैं याद में पागल रहता हों
वो आंसू बन के टपकता है


मैं बात किसी से करता हूँ
वो दिल ही दिल में कुढ़ता है


ठेस कोई दिल को जो लगे
वो ज़ख्म पे मरहम रखता है


जब गर्मी बदन जलाती है
वो बादल बन के बरसता है

Friday, 10 July 2009

शाम की दहलीज़ पर...


फिर ४ जुलाई की शाम आई थी , हाँ इस बार कुछ मुख्तलिफ थी , मैं तनहा था , अकेला उस वीराने में बने इक सुनसान घर में ... किसी आवाज़ का कोई गुज़र न था , चिडयों की चेह्चेहाहत कभी कभी तारीकी की दबीज़ चादरों में लिपटे रात के सन्नाटों को चीरती हुई मेरे घर के कोने में शोर मचा जाती थी ... रौशनी के नाम पर फ़क़त इक दिया था , टिमटिमाता हुआ ... कभी कभी जुगनुओं का कोई झुंड आता और अंधेरे घर में रौशनी के चाँद टुकड़े बिखेर कर चला जाता , आँखें दूर तक उन के चमकते अक्स देख कर उन का पीछा करतीं , दिल चाहता दौड़ कर बुला लें , मगर लाहसिल , वो देर तक न ठहरे थे न ठहेरने वाले थे , आख़िर मुफ्त में कितनी रौशनी लुटा पाते वो भी ... गाँव से दूर बाग़ में बना मेरा आशियाना मेरी तन्हैओं से आबाद था ...
उफ़ कितनी जानलेवा थी वो तन्हाई ... बिज्लिओं की गडगडाहट ने कान के परदे सुन कर दिए थे ...रोशनदान से बारिश की कुछ बूँदें अन्दर आ रही थी , शायद बाहर बारिश शुरू हो गई थी , हवा तेज़ हो चुकी थी , बारिश की बौछारें तेज़ हवा के साथ घर के अन्दर क़दम रखने लगी थी ... घर के इर्द गिर्द लगे हुए आम और इमाल्तास के दरख्तों ने अपने पत्ते ख़ुद से जुदा कने शुरू कर दिए थे , हवा में तेज़ी बढती जा रही थी ... अकेले घर का दिया भी अब तेज़ हवा से लड़ रहा था , शायद कुछ और जीने की तमन्ना थी उस की ... या फिर शायद मुझे कुछ देर और अपनी रौशनी देने के लिए वो हवा से हाथापाई कर रहा था , शायद कहीं बिजली गिरी थी , यकायक तारीकी में डूबा घर उजाले में नहा गया था , दीवारें जैसे हिल गई थी , कान के परदों से बड़ी देर तक बिजली की बाज़गश्त टकराती रही , अचानक गिरने वाली बिजली ने खौफ को मेरी आंखों का पता बता दिया था , खौफ का साया मेरी आंखों के सामने गर्दिश कर रहा था , मुझे डर तो नही लगता था मगर जाने क्या था उस बिजली में कौफ़ से मेरा बदन काँपने लगा था ... पियास से हलाक सूख गया था ... मैं बेशुध हो कर पास ही पड़ी कुर्सी पर बैठ गया , बारिश अब भी जारी थी , ऐसा लग रहा था जैसे आसमान अपना सारा बार ज़मीन के सीने पर लाड कर ही दम लेगा ... बारिश से लुत्फंदोज़ होने की तमन्ना दिल में बराबर कचोके लगा रही थी , वैसे भी गर्मी की शदीद मार झेल कर बदन जवाब दे चुका था ।
कुछ सोचते हुए मैं भी उठ खड़ा हुआ ... अब में बरामदा और राहदारी से गुज़रता हुआ लान में पहुँच चुका था , बारिश की ठंडी बूँदें मेरे प्यासे बदन के पोर पोर को प्यार से नहला रही थी ... उस की तासीर मेरी रूह को छु रही थी , बड़ी देर तक उस बारिश में भीगता रहा ... शायद जेहन के परदों से कोई याद हो कर गुज़र रही थी ... लान में मौजूद हर चीज़ में कुछ यादें , कुछ बातें इक बिछडे साथी की याद दिला रही थी ... हाँ शायद यही की काश वो नरम वो नाज़ुक बाहों के घेरे आज मेरे बदन से लिपटे होते ! काश वो पास में होते ! शायद हम इस नरम वो नाज़ुक और मस्तानी हवा से बहुत देर तक लुत्फंदोज़ होते रहते ... बारिश अब बहुत धीमी हो चुकी थी , इक्का दुक्का बूँदें अब भी ज़मीन की प्यास बुझाने का काम कर रही थी , आसमान की तरफ़ निगाहें उठाई , कुछ सितारे और कुछ बादलों के बीच से चाँद बाहर आने की कोशिश कर रहा था ... हाँ वाही आधा अधूरा चाँद ...देखते ही दिल वो दिमाग अपने चाँद की तरफ़ दौड़ता चला गया , रोकने की लाख कोशिश की मगर सब बेकार रही ... फिर ख़यालात की टिड्डियाँ मेरी यादों पर हमला आवर हो गईं , इक इक कर के उन के साथ गुज़रे तमाम ज़िन्दगी के हसीं लम्हात , अनमोल पल और तमाम औराकेपरीशां उलटने शुरू कर दिए ।
वो भी जुलाई ही का महीना था ... हाँ शायद तारीख भी यही थी , बारिश भी तो ऐसे ही हो रही थी , नही शायद इस से भी तेज़ थी ...उस दिन तो आसमान जी भर के रोया था , बिजली इक बार नही कई बार गरजी थी , मेरे घर की बेपनाह तारीकिओं को आसमानी बिज्लिओं की चमक ने कई बार उजाले मुफ्त बांटे थे ... मगर ... वो रात कितनी सुहानी थी ... शायद तुम थे इस लिए ... कितना प्यारा अहसास था , कितनी बार हम ने उस बिजली का शुक्रिया अदा किया था , हाँ वाही बिजली जो दूर खड़े दो कालिब को यकजान कर के अपने देस चली गई थी ...
तुम्हें याद होगा उस दिन की तन्हाई ने हमें कितनी खुशियाँ दी थी , हाँ दरोदीवार गवाह हैं , वो चाँद भी गवाह है , शायद इसी लिए आज मुझे तनहा देख कर वो भी आँख मचोली खेल रहा था , हाँ कितनी अच्छी और कितनी प्यारी थी वो रात , बारिश और तुम्हारे हसीं कुर्ब ने मेरे सुनसान घर की साड़ी तनहाइओं को मार डाला था ,... आज भी जुलाई की वाही तारीख थी , वाही घर , वाही मौसम , वाही बारिश , मगर आज कुछ भी अच्छा नही लग रहा था , बारिश में भीग कर बदन कप्कपने लगा था , ठंडी हवाएं बदन जला रही थी , हाँ शायद तुम नही थे इस लिए ... आसमान पर चाँद निकला था मगर मेरा चाँद न मालूम देस में जा बसा था .....

Tuesday, 7 July 2009

आख़िर हम में ऐसा क्या था?

दुनिया जाने किओं हम से जलती थी ...आख़िर हम में ऐसा क्या था? हम में कौन सी खराबी थी ? क्या हमारा इक दोसरे से बातें करना ...क्या हमारा इक दूसरे के साथ हँसना ... ये ठीक नही था ..या क्या उस की प्यारी चाहतें ... जो मेरे साथ रहती थीं ...क्या उस का प्यार भरा लहजा ...यही सब को तकलीफ देता था ...या ये की वो लड़की थी ... दुनिया किस वजह से हम से जलती थी नही मालूम ...मैं नही जानता ... पर ...कितना दुःख होता है दुनिया की खोखली सोच पर ... दुनिया वालों के ग़लत जेहन पर ...क्या हम दोनों के बीच कुछ चल रहा था ...हरगिज़ नही ...हो ही नही सकता था ...आख़िर दुनिया वाले ये किओं भूल जाते हैं की संसार में इक लड़के और इक लड़की के बीच सिर्फ़ आशिक , माशूक या महबूब और महबूबा का ही रिश्ता नही होता ... प्यार , इश्क मोहब्बत से बड़ा भी इक रिश्ता होता है ... हाँ उस में ये साड़ी चीजें मौजूद होती हैं ..क्या दोस्ती का रिश्ता ऐसा ही नही है ....

Sunday, 5 July 2009

दुल्‍हन जैसी लगती थी



इक लड़की थी अलबेली सी
हां मस्‍तानी अठखेली सी
प्‍यार भरा चेहरा था उसका
आंखें थी शर्मीली सी
बालों में घटाएं थी जैसे
उड़ती थी और बरसती थीं
खुशबू बदन से फूटती थी
जैसे फूल चमेली सी
चाल में उसकी जाने क्‍या था
आंखें पीछा करती थी
गली से मेरी गुजरती थी
दुनिया जान छिड़कती थी
हम भी देखा करते थे
पाने की दुआएं करते थे
हसरत थी उससे मिलने की
कुछ कहने की कुछ सुनने की
हर रोज उसी दरवाजे से
हम उसको देखा करते थे
था दिल में जो प्‍यार छुपा
कहने से उससे डरते थे
इक वक्‍त हुआ देखा न उसे
शायद अब वो न निकलती थी
इक रोज नजर थी उस पर पड़ी
उफ क्‍या लगती थी क्‍या दिखती थी
कान में झुमका, मांग में अफशां
दुल्‍हन जैसी लगती थी

Saturday, 4 July 2009

यादों की कुर्चियाँ

समंदर से आती लहरों के बीच ..साहिल की रेत पर ...सूखे खुजूर के पेड़ के नीचे बैठ कर भूरी आंखों ...काली जुल्फों वाला शहजादा ...पुरनम आंखों ...घम्ज़दा दिल के साथ ...ऐसा लगता था जैसे बीते दिनों की यादें ...टूटे सपनों और बिखरे खुवाबों की कुर्चियों को अपनी पलकों से चुनने की ..नाकाम कोशिश कर रहा था ...

Friday, 3 July 2009

चाँद की रौशनी में नहाया न कर

ऐ सनम संगदिल दिल जलाया न कर
गम की सुइयां यहाँ पर चुभाया न कर
प्यार दिल में नही रूह में है बसा
तू मेरे इश्क को आजमाया न कर
मेरी आंखों में सपने हैं तेरे सजे
मेरी आंखों से नीदें चुराया न कर
सारे जुगनू बदन से लिपट जायें गे
चाँद की रौशनी में नहाया न कर
चाह कर भी तुझे हम मना न सकें
रूठ कर के कभी दूर जाया न कर