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Thursday, 8 October 2009

गरीबों का लेखक- मुंशी प्रेम चंद

मुंशी प्रेम चंद की पुण्यतिथि पर खास

अगर हिनदुसतान को ताज महल जैसी हसीन इमारत पर फ़ख़्र है, कुतुब मीनार की बलंदियों पर नाज़ है और लाल किला की मजबूती पर उस की छाती चौड़ी हो जाती है तो वहीं रबिन्द्र नाथ टैगोर की कविताओं, बुल्बुले हिन्द सरोजनी नाइडो की कुर्बानियों और मुंशी प्रेम चंद जैसे महान लेखक के कारनामों को याद करके उसकी आंखों में चमक आ जाती है।
एक गरीब कलर्क की कुटिया में आंखें खोलने वाले धनपत राय ने शायद अपने ख़्वाबों में भी ना सोचा हो कि वह एक दिन हिनदुस्तान का नाम रोशन करेगा और अदब की दुनिया में प्रेम चंद बन कर दूसरों की रहनुमाई करेगा। 8-10 साल तक फारसी की पढ़ाई करने के बाद जब अंग्रेज़ी पढ़ाई का सिलसिला शुरू हुआ 15 साल की उम्र में शादी हो गई और एक साल के बाद पिता का देहान्ता हो गया। यानी एक दरवाज़े से खुशियों ने आना शुरू किया तो दुनिया के ग़मों ने खिड़कियों पर पहरा ड़ाल दिया।
15 साल के कमज़ोर कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बोझ आ पड़ा और फिर लड़कों को टियुशन पढ़ा कर घर का बोझ संभला, शिक्षा विभाग में नौकरी मिली औऱ इसी दौरान प्रेम चंद ग्रेजुएट हो गए।
छोटी उम्र में कहानियों से प्रेम ने प्रेम चंद को कहानियां लिखने का हौसला बख़्शा और 1901 में ज़माना नाम की पत्रिका में कहानी लिखकर अपना सफर शुरू किया। छोटी छोटी कहानियों से शुरू होने वाला ये सफर अफसानों से गुज़रता हुआ नाविलों की सूरत इख़तियार कर गया और प्रेम चंद की कलम ने रूठी रानी, कृष्णा, वरदान, प्रतिज्ञा से चलते चलते प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमी, कर्मभूमी, गोदान और गबन जैसी नाविलें लिख कर दुनिया को चौंका दिया।
इस में कोइ शक नहीं गंगा जमुनी तहज़ीब की सरज़मीन बनारस से 6 मील दूर पर बसे लम्ही गांव में एक मामूली किसान के घर 31 जुलाई 1880 में जन्म लेने वाले प्रेम चंद जिन्दगी भर गांव और दिहातों में बसने वाले, झोंपडों में रातें बसर करने वालों और खेत की धूल को अपने पसीने से तर कर के रोटी खाने वालों की आवाज़ रहे।
प्रेम चंद ने जिन्दगी भर कहानियों और उपन्यासों को अपना हमराह बनाए रखा और हर कहानी में ज़मीन और खास कर हिनदुस्तान से जुड़ी परेशानियों और गरीब जनता के मुद्दों को उठाया। हकीकत पसंदी के इस अंदाज़ ने मुंशी प्रेम चंद को वो मक़बूलियत दी कि पूरा हिनदुस्तान उनका दीवाना बन गया।
चिलचिलाती धूप में ज़ख़्मी परिंदे की तरह सफर करने के हौसले प्रेम चंद को बहुत ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया। मगर जिंदगी की तमाम खुशियों और मध्यम वर्ग के हर दुख़ दर्द को अलफ़ाज़ के रंगों में ढालने वाला कलम का ये सिपाही 8 अकटूबर 1936 में हज़ारों आंखों को आंसुओं में तर करता हुआ एक ना मालूम देस की तरफ सिधार गया


10 comments:

अमृत कुमार तिवारी said...

हम प्रेमचंद की कहानियों को पढ़ते हुए बड़े हुए हैं। उनकी कहानियों ने हमे वो नज़र दी जिससे हम भारतीय समाज विशेष को देखना शुरू किए। बेहद ही अच्छा लगा कि आपने महान लेखक के पुन्यतिथि पर यह लेख लिखा। प्रेमचंद के साथ ही आपको भी सलाम...
जय हिंद

वन्दना said...

prem chand ji ki punya tithi pa runhein naman.

kshama said...

Munshi Premchand har kisee ko apne se lagte the...chahe ameer hon, chahe gareeb, kyonki unkee lekhneese zindagee kee asliyat utartee rahee..

ज्योति सिंह said...

aapke blog pe mahan hastiyon ki amulya jaankaariyaan hai tyohar ke baad ek-ek kar padhungi ,happy diwali aap sabhi ko .

balmukund singh said...

एक चिंग़ारी....!
***********-**********
जलती है एक चिंग़ारी,
ज्वाला बनकर धकधक धक
धकधक धक, धकधक धक..!

डब्बो से डब्बो को जोड़े,
लौहपथ़ पे सरपट दौड़े,
गऱजन करती श़ोर मचाती,
इंकलाबी जोश़ जग़ाती ,
चित्कारो से राह़ बनाती,
इंज़न बढ़ती धकधक धक
धकधक धक ,धकधक धक..!

कबतक चुप रहोग़े जानी,
पीते रहोग़े माँग़कर पानी !
अपने ही अधिकारो से ,
ये है कैसी नाद़ानी ...?

सुनो..!
थोढ़ी मेरी भी वाण़ी.....!
तोढ़ती है ख़ामोशी ,
छोटी सी एक ठक़ठ़क ठ़क
ठ़कठक़ ठ़क , ठ़कठक़ ठ़क..!!
जलती है एक चिंग़ारी ,
ज्वाल़ा बनकर धकधक धक...
धकधक धक , धकधक धक !!!

एक सोंच ही है काफ़ी,
अंधकार मिटाने को ,
"एडीस़न" ने जो ठानी ,
रौश़नी फैलाने को.!
कर दी दुनिय़ा उसने रौश़न ,
इक पल में ही , झक़झक़ झक़
झक़झक़ झक़ , झक़झक़ झक़ !!
ज़लती है एक चिंग़ारी,
ज्वाला बनकर ,धक़धक़ धक़,
धक़धक़ धक़ ,धक़धक़ धक़..!!!

अनवर हुसैन अनु

(आप की ज़ीत पे मेरी आम आदमी व अरविंद जी को मेरी ये भेंट )

...

balmukund singh said...

इसलिए तो तुमहे चुमना चाहता हुं
तुमहारे जिसम के अंग-२ को देखना चाहता हुं ,
उस अहसास को , कागज मे गढ़ना चाहता हुं
तेरे लवो की जुंबिश को,
तेरे जिस़म की गरमी को,
गज़ल मे लिखना चाहता हुं
तेरी आंखो से तेरी जिस़म मे,
तेरी जिस़म से तेरी रूह के दरमियॉ,
इक कलाम बनाना चाहता हुं
तुझे अपनी मोहबबत का ,
ताजमहल बनाना चाहता हुं,
ताजमहल बनाना चाहता हुं,
तुझे गज़ल बनाना चाहता हुं

balmukund singh said...


छुुप छिप कर देखना ,
ख्यालो मे तड़पना ,
ईश्क कि ञृगांर है.!
ईश्क कि ञृगांर है.!
जो है तेरे दिल मे,
बता दे उसे ,
यू हि त़ड़पना बेकार है .!
यू हि त़ड़पना बेकार है .!
हो न हो ,
उसे भी तुझ जैसे
किसी हमदम का इंतजार है.!
किसी हमदम का इंतजार है.!
अनवर हुसैन अनु
अनवर हुसैन अनु

balmukund singh said...

हम है खामोश, मऩ बेच़ैन कयु है
तढ़पती सेह़राह पे, रेत का समनद़र कयु है ?
तेरे इतने करिब़ है "अनवर",
फिऱ भी अंधेरा क़यु है ...?
फिऱ भी अंधेरा क़यु है ...?
खुद़ को जलाती है शम़मा,
रौश़नी के लिए ,
जलने को तड़पता है परवाना,
स़ोचता है,
होता सवेरा कयु है...?
होता सवेरा कयु है...?
कितने करिब़ है चॉद - सुरज़,
चंदा पे अंधेरा कयु है.. ?
तड़पती स़ेहरा पे ,
रेत का समन्द़र क्यु है. ?
हम है खामोश़ , मन बैच़ेन क्यु है ?
By अनवर हुसैन " अनु"

balmukund singh said...

तनि भोज़पुरीयो मै..सुनी....!
**--*-****-*******-*
आपन तो हर दिन होल़ी ,
हर रात दिवाल़ी बा ...!
हर रात दिवाल़ी बा ...!
का धरती , का आस़मान,
साऱा जह़ॉन, आप़न बा ...! !
(२)
ज़ेकरा से दिल़ मिलल, ओकरो से
ज़ेकरा से न मिलल ओकरो से !
बात़ करेलीं मोहब्बत से ,
ऐस़न आप़न , ख्याली बा..! !
आप़न तो हर दिऩ होल़ी ,
हर रात़ दिवाल़ी बा ....!!!
(३)
न मोटर , न बंग़ला..
थ़रियो देख: , खाली बा ..!
तहियो....
आपन हर दिऩ होल़ी ...
हर रात़ दिव़ाली बा .....!!
By अनवर हुसैन " अनु"

balmukund singh said...

तनि भोज़पुरीयो मै..सुनी....!
**--*-****-*******-*
आपन तो हर दिन होल़ी ,
हर रात दिवाल़ी बा ...!
हर रात दिवाल़ी बा ...!
का धरती , का आस़मान,
साऱा जह़ॉन, आप़न बा ...! !
(२)
ज़ेकरा से दिल़ मिलल, ओकरो से
ज़ेकरा से न मिलल ओकरो से !
बात़ करेलीं मोहब्बत से ,
ऐस़न आप़न , ख्याली बा..! !
आप़न तो हर दिऩ होल़ी ,
हर रात़ दिवाल़ी बा ....!!!
(३)
न मोटर , न बंग़ला..
थ़रियो देख: , खाली बा ..!
तहियो....
आपन हर दिऩ होल़ी ...
हर रात़ दिव़ाली बा .....!!
By अनवर हुसैन " अनु"