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Tuesday, 4 January 2011

एहसास



सोच रहा हूं
ये साल का नया सूरज है
या फिर तुमने शबनम से अपना चेहरा धोया है
ये चांद की ठंड़ी रौशनी है
या फिर तुम्हारी आंखें मेरे चेहरे पर बिछी हैं
ये मुरादों का कोई तारा टूटा है
या फिर तुम धीरे से मुसकुराई हो
ये हवा के झोंकों से होने वाली सरसराहट है
या फिर तुम चुपके से मेरे कानों में सरगोशी कर रही हो
ये आसमान के दामन में चमकता हुआ चंदा है
या फिर तुम्हारा टूटा हुआ कंगन आसमान ने अपने आंचल में छुपा लिया है
ये बारिश के पहले होने वाली बदली है
या फिर तुनने अपने ज़ुल्फों को हवा में लहराया है
ये आंसू मेरे गालों पर रेंग रहे हैं
या फिर तुम्हारी सांसों की गर्मी मेरे रूख़्सारों पर महसूस हो रही है
सोचता हूं
तुम होती तो बतला देतीं
अकेले कितना मुश्किल है सब कुछ समझ पाना …!!!!

5 comments:

sada said...

बेहतरीन शब्‍द रचना ।

kshama said...

Sundar!

Salahuddin said...

bahut khub sundar ahsas.

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi said...

hai nehayat khoobsoorat yeh blog
Jo hai asri aagahi ka tarjumaan

vikas vashisth said...

vah... zabardast...
kyon bar bar padhne ko dil karta hai tere alfazon ko...
ya kahun k inme mujhe bhi kuch apna sa nazar aa raha hai...