
सोच रहा हूं
ये साल का नया सूरज है
या फिर तुमने शबनम से अपना चेहरा धोया है
ये चांद की ठंड़ी रौशनी है
या फिर तुम्हारी आंखें मेरे चेहरे पर बिछी हैं
ये मुरादों का कोई तारा टूटा है
या फिर तुम धीरे से मुसकुराई हो
ये हवा के झोंकों से होने वाली सरसराहट है
या फिर तुम चुपके से मेरे कानों में सरगोशी कर रही हो
ये आसमान के दामन में चमकता हुआ चंदा है
या फिर तुम्हारा टूटा हुआ कंगन आसमान ने अपने आंचल में छुपा लिया है
ये बारिश के पहले होने वाली बदली है
या फिर तुनने अपने ज़ुल्फों को हवा में लहराया है
ये आंसू मेरे गालों पर रेंग रहे हैं
या फिर तुम्हारी सांसों की गर्मी मेरे रूख़्सारों पर महसूस हो रही है
सोचता हूं
तुम होती तो बतला देतीं
अकेले कितना मुश्किल है सब कुछ समझ पाना …!!!!
5 comments:
बेहतरीन शब्द रचना ।
Sundar!
bahut khub sundar ahsas.
hai nehayat khoobsoorat yeh blog
Jo hai asri aagahi ka tarjumaan
vah... zabardast...
kyon bar bar padhne ko dil karta hai tere alfazon ko...
ya kahun k inme mujhe bhi kuch apna sa nazar aa raha hai...
Post a Comment