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Sunday, 3 January 2010

मुझे मंज़िलों का पता नहीं मेरा कारवां कहीं और है


मेरी हसरतें मेरे साथ हैं मेरी आरज़ू कहीं और है
मुझे रास्ता मेरा मिल गया मेरी मंज़िलें कहीं और हैं

यहां कोई दर्द ना ग़म कोई नई आरज़ू नया जोश है
मेरी ज़िंदगी मेरे साथ चल मेरी धड़कनें कहीं और हैं

मेरी मान मेरे यार तू मुझे रोक ना बीच मोड़ पर
मुझे मंज़िलों का पता नहीं मेरा कारवां कहीं और है

मुझे मत सुना ये कहावतें मेरे हौसलों को ना तोड़ यूं
मेरे साथ मां की दुआएं हैं मेरे ख़्वाब भी कहीं और हैं

13 comments:

शबनम खान said...

Razi sahab....ye naye sal me kis karwe me chal diye....manzilo ko yu n chodiye....
hmesha ki trha is nazm me bhi ek udaasi ha....par kahi n kahi d ek vishvaas ek umeed bhi kahi dikhti ha...
isi tarha likhte rahiye...

Dev said...

मेरे साथ मां की दुआएं हैं मेरे ख़्वाब भी कहीं और हैं
बहुत अच्छे राज़ी साहब
नया साल मुबारक हो

Suman said...

मुझे मत सुना ये कहावतें मेरे हौसलों को ना तोड़ यूं
मेरे साथ मां की दुआएं हैं मेरे ख़्वाब भी कहीं और हैं

nice

Udan Tashtari said...

मुझे मत सुना ये कहावतें मेरे हौसलों को ना तोड़ यूं
मेरे साथ मां की दुआएं हैं मेरे ख़्वाब भी कहीं और हैं

-बहुत उम्दा!!

विनोद कुमार पांडेय said...

भाई बहुत बढ़िया लिखे है आप तो...अच्छा लगा..धन्यवाद जी!!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

मेरी मान मेरे यार तू मुझे रोक ना बीच मोड़ पर
मुझे मंज़िलों का पता नहीं मेरा कारवां कहीं और है

बहुत बढ़िया लिखा है आपने ...शुक्रिया

kshama said...

मुझे मत सुना ये कहावतें मेरे हौसलों को ना तोड़ यूं
मेरे साथ मां की दुआएं हैं मेरे ख़्वाब भी कहीं और हैं..
kya gazab kee baat kahee...!

अमृत कुमार तिवारी said...

मित्र, आपकी ये रचना पढ़कर दिल में जोश और भावनाओं का सैलाब आ गया है। मन कर रहा है कि आपकी आफज़ाई में सिर्फ आपकी तारीफों के कसीदें पढ़ता रहूं।

शहरोज़ said...

मेरी मान मेरे यार तू मुझे रोक ना बीच मोड़ पर
मुझे मंज़िलों का पता नहीं मेरा कारवां कहीं और है


bahut khoob!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

शुक्रिया रज़ी साहब
अच्छी ग़ज़ल है
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

निर्मला कपिला said...

मुझे मत सुना ये कहावतें मेरे हौसलों को ना तोड़ यूं
मेरे साथ मां की दुआएं हैं मेरे ख़्वाब भी कहीं और हैं
मेरी मान मेरे यार तू मुझे रोक ना बीच मोड़ पर
मुझे मंज़िलों का पता नहीं मेरा कारवां कहीं और है
एक एक शब्द दिल को छू गया हमेशा की तरह लाजवाब लिख रहे हो बधाई आशीर्वाद्

ज्योति सिंह said...

मेरी मान मेरे यार तू मुझे रोक ना बीच मोड़ पर
मुझे मंज़िलों का पता नहीं मेरा कारवां कहीं और है
bahut hi laazwaab .

saurabh said...

bahut khubsurat.......