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Wednesday, 26 August 2009

छोटू ज़रा चाय लाना....

उर्वशी, लछ्मी और सुचित्रा नाम की तीन अदाकाराओं के घर पर पुलिस ने छापा मार कर वहां से बाल मज़दूरों को आजाद कराया। चर्चाऐं तो ऐसे हो रहीं थी कि ऐसा महसूस हो रहा था मानो जंग ही जीत ली हो। मगर क्या कर सकते हैं कभी कभी तो कोई भला काम होजाता है ऐसे में अगर उस पर भी वाह वाही न बटोरने को मिले तो काभी तकलीफ होगी। मगर क्या सिर्फ तीन लोगों के यहां से कुछ बच्चों को आज़ाद करा देने से बाल मज़दूरी खत्म हो जाएगी इसकी उम्मीद करना ज़रा मुश्किल है। इसकी वजह है और हम नीचे इसी को बयान करने की कोशिश कर रहे हैं।

छोटू ज़रा चाय लाना, अरे छोटू गाड़ी धुल दे साहब बाहर जा रहे हैं, पोछा मार दे छोटू, ज़रा गिलास देना छोटू, छोटू ये सामान निकाल देना, झाड़ू मार दे छोटू … ये वह आम जुम्ले हैं जो हर रोज हर लम्हा कान के परदों से टकराते रहते हैं, कहीं भी जाएं, दोस्तों के साथ चाय की दुकान पर या खाना खाने के लिये होटल, सामान लाने के लिये किराने की दुकान पर या फिर बस में सफर पर।

चाय, खाना, सामान देने वाला और किराया लेने वाला 7-8 साल की उम्र से लेकर 15-16 साल का कोई ना कोई बच्चा ही होता है। आस-पास ऐसे न जाने कितने छोटू और बहादुर हैं जो अपनी ज़िन्दगी गुजारने के लिये अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिये किसी की गुलामी तो किसी की नौकरी करते नज़र आते हैं। उस उम्र में जबकि उन के नाज़ुक हाथों में कलम होना चाहिये उनके नाज़क हाथ झाड़ू लगाने और बरतन धुलने पर मजबूर हैं, जब उनके कंधों पर किताबों का बस्ता होना चाहिये था उस उम्र में वह किसी मालिकन के साथ सब्ज़ी लाने के लिये इस्तेमाल हो रहे हैं। ये वह बच्चे हैं जो खानदान के सब कुछ है, अपने परिवार के माई बाप हैं। ये उस मुल्क की दास्तान है जहां बाल मज़दूरी पर पाबंदी है।

आज़ाद हिन्दुस्तान की ये एक सच्ची तस्वीर हैं। अगर यक़ीन न आए तो अपने आस पास देखिए इन बातों की सच्चाई खु़द-ब-खु़द सामने आजाएगी।

ये एक सच्चाई है कि हिन्दुस्तान जैसे आज़ाद मुल्क में एक अंदाज़ के मुताबिक 1 करोड़ 70 लाख बाल-मजदूर हैं। इसमें से 80 फीसद खेतों और कारखानों में काम करते हैं। बाकी खदानों, चाय बगानों, दुकानों और घरेलू कामों में हैं। इसमें से सबसे ज्यादा बच्चे तालीम से दूर हैं और खतरनाक हालतों में काम करते हैं। मुल्क के 1 करोड़ 70 लाख बाल-मजदूरों में से सिर्फ 15 फीसद को ही मजदूरी से आजादी मिल पायी है।

अगर देखा जाए तो यह चीज़ साफ तौर पर कही जा सकती है कि बच्चा मज़दूरी पर पाबंदी लगने के दो दहाईयां गुज़र जाने के बाद भी हालात वैसे के वैसे बने हुए हैं। शायद आगे भी ये सिल्सिला जारी रहे। क्योंकि जब तक बाल मज़दूरी के पीछे छुपी मजबूरियों को नही जाना जाता उस के खातमे के ख्वाब देखना महज़ जागती आंखों का ख्वाब होगा जिस की कोई हकीकत हो ही नही सकती।

आज भी हिन्दुस्तान के अंदर ऐसे लोगों की एक लंबी तादाद है जिन की आमदनी रोजाना 20 रूपये से भी कम है, गौर कीजिये इस दौर में जब्कि मंहगाई आसमान से बातें कर रही है, हर चीज़ की कीमतों में बेतहाशा इज़फा हो रहा है, 20 रूपये आमदनी वाला आदमी किस तरह खाएगा और अपने परिवार को खिलाएगा?

बाल मज़दूरी को खत्म करने के लिए कोशिश तो होनी ज़रूरी है मगर ये धयान रखना उस से ज्यादा जरूरी है कि आप जिस बच्चे को आजाद करा रहे हो वह कल क्या खाएगा या वह परिवार जो उस की कमाई से जीता है उस की हालत क्या होगी? क्या हिन्दुस्तान इस के लिए तय्यार है? अगर हां तो शायद कुछ अच्छी ख़बर आगे कुछ सालों में देखने को मिले। याद रहे कि भूके पेट पढ़ने में मन नहीं लगता है और मिड डे मील से सिर्फ बच्चे का पेट भरता है उस के मजबूर मां बाप और भाई बहनों का नहीं जो उसे उस की जान से ज्यादा प्यारे हैं।

9 comments:

raj said...

बाल मज़दूरी को खत्म करने के लिए कोशिश तो होनी ज़रूरी है मगर ये धयान रखना उस से ज्यादा जरूरी है कि आप जिस बच्चे को आजाद करा रहे हो वह कल क्या खाएगा या वह परिवार जो उस की कमाई से जीता है उस की हालत क्या होगी? क्या हिन्दुस्तान इस के लिए तय्यार है?bahut sahi kaha apne....

kshama said...

सवाल केवल बाल मज़दूरी का नही है ...काम करना बुरी बात नही ,गर साथ पढाई भी जारी रहे ..बाल मजदूरों को NGOs की शिकयातसे हटाया गया ..अब क्या NGOs उन्हें पुनर्स्थापित भी करेंगे ? या फिर ये बच्चे कुछ दिनों बाद अन्य कहीँ काम ढूँढ लेंगे ! और मैंने ऐसे भी बच्चे देखे, जिन्हें कतई भी पढ़ाई नही करनी होती...ऐसे में गर ये बच्चे बिना काम के रह जाएँ,तो समाज विघातक कामों में जुट जाते हैं! ये परिणाम और भी भयंकर है...!

Kewal Bharat me nahee, US/UK mebhee bachhe kaam karte hain...jahan zaroorat hai,wahan yahee nazare dikhenge...

पी.सी.गोदियाल said...

अच्छी बात है कि आपने बाल मजदूरी जैसे हमारे समाज में फैले अभिशाप का मुद्दा उठाया ! लेकिन साथ में कोई यह नहीं बताता कि अगर आप इन बच्चो को बाल मजदूरी करने से रोक देंगे तो ये उसके बाद खाएँगे क्या ? बड़ी-बड़ी बाते करने वाली हमारी सरकारे उनके पुनर्वास के लिए क्या कर रही है, जबाब है कुछ भी नहीं ! और एक मजदूर जब ६०-८० रूपये की धिहाडी लेकर शाम को घर लौटता है तो एक कीलो दाल भी १०० रूपये की है, बच्चो को खिलायेगा क्या कभी किसी ने इस और सोचा ?

Nirmla Kapila said...

क्योंकि जब तक बाल मज़दूरी के पीछे छुपी मजबूरियों को नही जाना जाता उस के खातमे के ख्वाब देखना महज़ जागती आंखों का ख्वाब होगा जिस की कोई हकीकत हो ही नही सकती।
बिलकुल सही लिखा है आपने समस्या की जढ तक जाना जरूरी है आपके आलेख भी कहानियों कीजान दार और शान दार होते हैं बधाई

ओम आर्य said...

यह बात बहुत ही सही है कि बाल मज्दूरी से ज्यादा.......काम से छुडाने से ज्यादा उनके खाने और उनके परिवार जो उसपर आश्रित परिवार भी का क्या होगा .........ऐसे बच्चो की समस्या ये होती है कि कल का खाना भी नसीब नही होता अगर उन्हे काम से छुडा दिया जाता है तो भूखो मरने की समस्या बन जाती है ............मज्दूरी से छुडाने से अच्छा है कि गरिबी को पहले हटाया जाय .........बाल मजदूरी का नारा बुलन्द करने से कुछ नही होगा ........वैसे एक अच्छी लेख जो ऐसे समस्याओ पर प्राकाश डालने मे सक्षम है ...............बधाई

विनय ‘नज़र’ said...

यह कैसे ख़त्म हो जाये, बड़े-बड़े IAS, IPS सुरक्षा कारणों से बच्चों से काम करवाना पसंद करते हैं क्योंकि इन्हें आसानी मारा-पीटा जा सकता है।
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तख़लीक़-ए-नज़र

सतीश सक्सेना said...

पहली बार पढ़ा ,बढ़िया लिखते हो ! शुभकामनायें !

manoj kumar saini said...

bahut khoob, i really impresd you and heart touching....

Aparna Bajpai said...

Jis din desh me chhotu log kam karna band kar denge..... desh vanhi ka vanhi ruk jayega . good thought...