
उसको खुशियाँ, हर सितम मुझसे मिला
पा लिया था वक्त ने इक रास्ता
जब क़दम थकने लगे तो हमसफ़र मुझसे मिला
इक हरफ भी याद न था प्यार का
वो भी ऐसे मोड़ पर मुझसे मिला
आँख के दरया का हर कतरा उछल कर
चश्म से छलका जब वो मुझसे मिला
न कोई शिकवा था न कोई गिला इस बात का
तू क्यों इतनी देर से मुझसे मिला
इक अजब सी सादगी हम में भी है
सब कुबूल नाम पर उसके जो मुझसे मिला
10 comments:
welcom back razi sahab
aate jabrdast likh diya hai
khoobsurat
वाह क्या बात है।
पा लिया था वक्त ने इक रास्ता
जब क़दम थकने लगे तो हमसफ़र मुझसे मिला
बहुत ही उम्दा।
kya baat hai .............jawaab nahi
आँख के दरया का हर कतरा उछल कर
चश्म से छलका जब वो मुझसे मिला
बहुत खूब 'चश्म से आँख की दरिया का छलकना'
बहुत ख़ूब!
accha likha raji sahab...itne din ghar mat jaya karo...apke blog pe naye lekh padhne ko taras jata hu
इक हरफ भी याद न था प्यार का
वो भी ऐसे मोड़ पर मुझसे मिला..kitna khoobsurat likha hai..sahi hai jaha umeed na ho waha milta hai.....
ज़िन्दगी में दर्द बस मुझ से मिला
उसको खुशियाँ, हर सितम मुझसे मिला
superb...deep & touching...
बहुत सुन्दर रचना है भाई. लाजवाब
एक दर्द है इस सीने में भी
कि वो मिलकर भी मुझसे ना मिला
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