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Saturday, 15 August 2009

तू क्यों इतनी देर से मुझसे मिला

ज़िन्दगी में दर्द बस मुझ से मिला
उसको खुशियाँ, हर सितम मुझसे मिला

पा लिया था वक्त ने इक रास्ता
जब क़दम थकने लगे तो हमसफ़र मुझसे मिला

इक हरफ भी याद न था प्यार का
वो भी ऐसे मोड़ पर मुझसे मिला

आँख के दरया का हर कतरा उछल कर
चश्म से छलका जब वो मुझसे मिला

न कोई शिकवा था न कोई गिला इस बात का
तू क्यों इतनी देर से मुझसे मिला

इक अजब सी सादगी हम में भी है
सब कुबूल नाम पर उसके जो मुझसे मिला

10 comments:

Sonalika said...

welcom back razi sahab

aate jabrdast likh diya hai

khoobsurat

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाह क्या बात है।
पा लिया था वक्त ने इक रास्ता
जब क़दम थकने लगे तो हमसफ़र मुझसे मिला
बहुत ही उम्दा।

ओम आर्य said...

kya baat hai .............jawaab nahi

M VERMA said...

आँख के दरया का हर कतरा उछल कर
चश्म से छलका जब वो मुझसे मिला
बहुत खूब 'चश्म से आँख की दरिया का छलकना'

विनय ‘नज़र’ said...

बहुत ख़ूब!

Anonymous said...

accha likha raji sahab...itne din ghar mat jaya karo...apke blog pe naye lekh padhne ko taras jata hu

raj said...

इक हरफ भी याद न था प्यार का
वो भी ऐसे मोड़ पर मुझसे मिला..kitna khoobsurat likha hai..sahi hai jaha umeed na ho waha milta hai.....

Anonymous said...

ज़िन्दगी में दर्द बस मुझ से मिला

उसको खुशियाँ, हर सितम मुझसे मिला

superb...deep & touching...

संजीव गौतम said...

बहुत सुन्दर रचना है भाई. लाजवाब

vikas vashisth said...

एक दर्द है इस सीने में भी
कि वो मिलकर भी मुझसे ना मिला