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Thursday, 31 December 2009

नया साल मुबारक हो

आज दिल से बस एक ही दुआ निकल रही है कि हर किसी को नया साल मुबारक हो... उसकी ज़िंदगी में कोई गम ना आए, हमेशा खुशियों का पहरा हो, कलियों की तरह खिलना और फूलों की तरह महकना हर किसी की पहचान बन जाए... हर आरज़ू हर तमन्ना हर चाहत पूरी हो... हर मकसद में कामयाब हों...कोई किसी से जुदा ना हो... हर किसी का ये नया सूरज हमेशा चमकता रहे...
ख़ुदा करे कि ये नया साल
तेरे दामन में
वह सारे फूल खिला दे
कि जिनकी ख़ुश्बू ने
तेरे ख़्याल में
शमऐं जलाए रखी हैं
तो नए साल पर अपने हौसले बलंद कीजिए...हर बुराई से टकराने का मन बनाईए और किसी ग़लत चीज़ से समझौता ना कीजिए...फैज़ की इस नज़म से पोस्ट ख़त्म कर रहा हूं
बोल, कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल, ज़ुबां अब तक तेरी है

तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जान अब तक तेरी है

देख की आहन-गर की दुकान में
तुन्द हैं शो'ले, सुर्ख है आहन

खुलने लगे कुफ्लों के दहाने
फैला हर एक ज़ंजीर का दामन

बोल, यह थोड़ा वक़्त बोहत है
जिस्म-ओ-जुबां की मौत से पहले

बोल की सच ज़िंदा है अब तक
बोल, जो कुछ कहना है कह ले

Friday, 18 December 2009

रात को ही क्यों...

एक वक्त था जब महबूबा से मिलने के लिए आशिक को रात से अच्छा वक्त कोई नहीं लगता था इस लिए वह जब आंचल रात का लहराए और सारा आलम सो जाए, तुम शमा जला कर ताज महल में मुझ से मिलने आ जाना की गुहार लगाया करता था, ज़ाहिर है हर किसी की चाहत भी तो यही होती है कि जब उस का महबूब उस की बाहों में हो और वह उसकी ज़ुल्फों में अपनी उंगलियां फेर रहा हो तो कोई उसे परेशान ना करे और इस चाहत को पूरा करने के लिए रात की तनहाई से अच्छा और कौन सा वक्त हो सकता है, इसी लिए महबूब के साथ चौदहवीं की रात को वक्त गुज़ारना बहुत दिलफरेब होता था, लगना भी चाहिए आखिर उस से अच्छा और क्या हो सकता है कि चांद अपनी खूबसूरत चांदनी के साथ दो प्यार भरे दिलों का साथ दे रहा हो।
मगर ये तो शायद उस वक्त की बात है जब हमारा जन्म भी नहीं हुआ था, हां शायद लैला मजनू और शीरीं फरहाद के ज़माने तक ही ये हालात रहे थे क्योंकि जब से हम इस दुनिया में आए हैं हमें तो कुछ और ही तजरूबा हुआ है। जैसे ही शाम का वक्त होता है, सूरज अपने बिस्तर समेटना शुरू करता है और सलेटी मायल सुर्ख आसमान के किनारे बहुत नीचे ढलान पर आफताब लुढ़कने लगता है तो कभी अम्मी आवाज़ देना शुरू कर देती हैं बेटा रात हो रही है कहीं मत जाओ, कभी बहन बाहर ना निकलने का मशवरा देती है तो कभी पापा घर पर ही रहने का फरमान सुना जाते हैं।
बच्पन से लेकर आज तक यही आलम है। दादी की अकसर कहानियों में जहां भी रात का ज़िक्र आता उसे सुनने में बहुत मज़ा आता था। रात की तारीकियों से जुड़ी कहानियां हमारी मुहब्बत बन चुकी थी।
एक बात हमारे दिमाग को हमेशा उलझाए रखती है कि आखिर ऐसा क्या था कि दादी तो इतनी अच्छी कहानियां सुनाती थीं और मां बाप हर बार रात से डराते ही रहते थे। समझ की उम्र को पहुंचने के बाद से ही इस पर गौर करने का दिल करने लगा। मुझे 'रात' की फितरत और उसके स्वभाव को समझने का चसका लग गया है। क्योंकि कहानियों के अलावा अगर मैंने हक़ीकत में अपने कानों से रात के मुतअल्लिक कुछ सुना तो यही मालूम हुआ कि 'रात' बुराईओं को जन्म देती है, हर दिन रात के बारे में नया तजरूबा होता है कभी कानों से आवाज़ टकराती है कि अंधेरा छाने लगा है, रात आने को है अपने घरों को चले जाओ तो कभी रात के सन्नाटों का खौफ़ दिला कर घरों में रहने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। खौफ़ और बुराईओं के लिए हमेशा से ही मैं ने रात को जाना है। मैं ने हमेशा यही पाया कि शायद रात ख़ौफ़, परेशानी, बुराई और ख़राबी की जड़ है। मैं ने इसके लिए ख़ुद तजरूबा किया। रात को उठ कर उस वक्त सुनसान रोड पर चला जब सारी दुनिया नींद की आग़ोश में खर्राटे लेती है, मगर क्या हुआ, मैं ने हर रात या तो ये महसूस किया कि किसी की चीख़ें मुझे आवाज़ दे रही हैं या कोई मदद के लिए गुहार लगा रहा नहीं तो किसी की हयात दम तोड़ रही है या फिर किसी की नब्ज़ उसका साथ छोड़ रही है और वह अपनी उखड़ी उखड़ी सांसों के साथ अलविदा कह रहा है।
ये सब देख कर मझे ये कुछ कुछ समझ आने लगा था कि आख़िर हमारे मां बाप हम्हें रात से क्यों डराते थे। शायद अब ज़माना बदल चुका था अब वह वक्त नहीं रह गया था जब रात भी दिन की तरह होता था जिसमें ना तो कोई ख़ौफ़ था और ना ही कोई डर। मगर आज कत्ल, ख़ून और दूसरी खतरनाक चीज़ें अंजाम देने के लिए रात का इस्तेमाल किया जाता था। मगर अब मुझे ये चीज़ खटकने लगी है कि आख़िर रात ही से क्यों डराया जा रहा है, दिन से क्यों नहीं? आख़िर वह कौन सा काम है जो अब दिन में नहीं होता? अब रात का इंतज़ार कौन करता है अब दिन में वह सब कुछ हो जाता है जिसे रात के काले साऐ में करने से आदमी डरता है तो फिर सिर्फ रात ही को क्यों बदनाम किया जाता है?

Thursday, 10 December 2009

एक नज़्म


1
उनसे बिछडे हुए एक अरसा हुआ
उनको देखे हुए इक ज़माना हुआ
लोग कहते हैं हम उनके दीवाने हैं
वो शमा और हम उनके परवाने हैं
प्यार उनके लिए मेरी आंखों में है
मेरा दिल मेरी जान उनकी सांसों में है

वह संवरती थी हम को दिखाने की ख़ातिर
ऐसे चलती थी हम को लुभाने की खातिर
उसकी ज़ुल्फें थी मुझको सुलाने की ख़ातिर
उसकी आंखें थीं मुझको पिलाने की ख़ातिर
जिस्म उनका था बस मेरी बाहों की ख़ातिर
प्यार उसको मेरी हर अदाओं से था
2
मैंने ऐसा सुना तो अचंभा हुआ
मैंने सोचा की ये भूल कैसे हुई

कि
प्यार अपना सभों की नज़र में रहा
बस हम्हें इसकी कोई ख़बर न हुई

३
ये अलग बात हम भी शायद उसके दीवाने थे
प्यार हमको भी था और उसको भी था
पर हवस की कोई भी निशानी ना थी

लेकिन

दुनिया उसको कुछ और रूप देती रही

४
मैं ने देखा ख़ता इसमें मेरी ना थी
सारी दुनिया नशे में उसके मख़मूर थी
सब पे उसके ही जलवों की परछाईं थी
याद करना उसे उनकी मजबूरी थी
शायद वो उनके ख़्वाबों की ताबीर थी
नाम मेरा लिया, दिल को ठंड़ा किया
याद उसको किया, रूसवा मुझको किया

Sunday, 6 December 2009

छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे…


6 दिसम्बर 1992 को जो घटना बाबरी मस्जिद की शहादत के रूप में हुई उसने ना सिर्फ हिंदुस्तानी तहज़ीब का ख़ून किया बल्कि भारतीय संमिधान का भी जनाज़ा निकाल दिया था। इस घटना ने जहां हर दिल को रोने पर मजबूर कर दिया था वहीं यह भी सोचने पर मजबूर कर दिया था कि आख़िर क्या अब यहां जम्हूरियत का कोई मुहाफिज़ नहीं है या फिर क्या अब हिंदुस्तानी लोग सेकियुलरिज़म से उकता चुके हैं?

आज उसकी 17वीं बरसी पर मैं अपने गमों का इजहार करता हूं साथ ही मैं आप की ख़िदमत में मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की मशहूर नज़म दूसरा बनवास पेश कर रहा हूं

छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे…

राम बनवास से जब लौट के घर में आये
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये
रक्से दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
छह दिसंबर को श्री राम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आये?

जगमगाते थे जहां राम के क़दमों के निशां
प्यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहां
मोड़ नफरत के उसी राहगुज़र में आये
धरम क्या उनका है, क्या जात है, यह जानता कौन?
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा, लोग जो घर में आये
शाकाहारी है मेरे दोस्त, तुम्हारा खंजर

तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्थर
है मेरे सर की खता ज़ख्म जो सर में आये
पांव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे
के नज़र आये वहां खून के गहरे धब्बे
पांव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे
राम यह कहते हुए अपने द्वारे से उठे
राजधानी की फ़िज़ा आयी नहीं रास मुझे
छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे।

Wednesday, 2 December 2009

मैं तुम बिन अधूरी हूं


मुसलसल ख़्वाब आते हैं

सूरज अपना सफर तय करके

अपने घर आराम करने जा रहा है

कोई पागल , दीवानी

बाल खोले, नन्गे क़दम, दीवानावार

तपती रेत पर सरपट भाग रही है

दुपट्टा उसके सर से होता हुआ

कांधे पर आ कर लटक गया है

उसकी बालियां कानों में झूला झूल रही है

उसके होंट प्यास से सूख गए हैं

उनकी सुर्खी कहीं गायब हो गई है

रेशमी ज़ुल्फों पर धूल की तह जम रही है

आंखों में रेत के हज़ारों ज़र्रे गड़ रहे हैं

रूखसारों पर आंसू के कतरों और

रेत के टुक्डों ने ज़ख्म का सा निशान बना दिया है

वह एक हाथ आगे बढ़ाए हुए है

ऐसा लग रहा है किसी को रोकने की कोशिश कर रही है

मुंह खुला हुआ है

ज़रा क़रीब जा के देखा

शक्ल और साफ हो गई

मगर

अब कुछ आवाज़ें भी सुनाई दे रही थी

‘‘सुनो साजन

तुम मत जाओ

मैं तुम से कुछ नहीं मांगूंगी

सुनो

लौट आओ

अब मुझे चूड़ी, कंगन

मेंहदी, बिंदिया

अफशां, लाली

कुछ नहीं चाहिए

सुनो

बस तुम लौट आओ

मैं तुम से कुछ नहीं मांगूंगी

सुनो साजन

मेरा हर सिंगार तुम हो

और मैं तुम बिन अधूरी हूं ’’

Sunday, 22 November 2009

तुम ईद मना लो तनहा तनहा हम रो लेंगे तनहा ही



मेरी पलकों पर जो सपने थे पल भर में चकनाचूर हुए
क्या ख़बर सुनाई ज़ालिम ने और हम ग़म से रनजूर हुए
क्या सोचा था इस बार अगर हम उनसे मिलने जाएंगे
हर वक्त हमारे साथ रहें कुछ ऐसे लम्हे लाएंगे
पर ख़ता हमारी थी शायद जो सपना पूरा हो न सका
क्या ख़बर सुनाई ज़ालिम ने हर सपना अपना टूटा था
मां बाप की हसरत रोती रही हर आस हमारी टूट गई
उम्मीद की इक हल्की सी किरन बस सामने मेरे बैठी थी
दामन पे हमारे दाग़ ना था फिर ऐसी सज़ा क्यों हम को मिली
हर वक्त यही दिल सोचा किया आंखें भी उसी के साथ रहीं
उस वादे का क्या करते हम जो उनसे लिया था पहले ही
उन नैनों को कैसे रूलाते हम जो खुशियां भूली बैठी थीं
कैसे ये कहते आएंगे ना हम इस बार रहेंगे तनहा ही
तुम ईद मना लो तनहा तनहा हम रो लेंगे तनहा ही

Friday, 20 November 2009

दम तोड़ती संस्कृति


भारत में महान हस्तियों की पूजा और उनकी महानता के गुणगान करने का रिवाज बहुत पहले से चला आ रहा है और इस में किसी तरह की कोई कमी नहीं छोड़ी जाती है शायद इसी वजह से किसी ने हिंदुस्तान को मुर्दा परस्तों का देश भी कहा था क्योंकि ये यहां किसी भी बड़ी हस्ती के मरने के बाद उसकी कदर में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी जाती है। उसके जीते जी चाहे उसके सर पर कोई साईबान ना रहा हो मगर मरने के बाद समाधी के रूप में उसे एक बहुत बड़ा घर दिया जाता। आप को ग़ालिब याद होंगे जिन्होंने उर्दू शायरी को एक नया अंदाज़ दिया था, ज़िन्दगी में इस महान आदमी के पास किराए का तंग सा मकान था और वह ये कहता फिरता था कि हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे मगर उसकी मौत के बाद इतना बड़ा हिस्सा उसके नाम कर दिया गया जिसका सपना भी उन्होंने नहीं देखा होगा।
लेकिन शायद ये रस्म धीरे धीरे अपने अंजाम को पहुंच रही है और अब किसी के पास इनकी चीज़ों पर तवज्जुह देने की ज़रूरत नहीं महसूस हो रही है। शायद इसी वजह से तो आज फ़िराक़ गोरोखपुरी के घर का ये हाल हो रहा है। बनवारपूर गाँव मे28 अगस्त सन 1896 को जन्म लेने वाले रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपने क़लम से भारत की आज़ादी के लिए जो कोशिशें कीं उससे कोई भी शख़्स ने इन्कार नहीं कर सकता है और शायद उनके इसी यौगदान के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुस्कार से सम्मानित किया गया था। मगर शायद अब इस यौगदान के धुंधले नक्श भी लोगों के ज़ेहन पर बाक़ी नहीं हैं।
ख़बर तो ये है कि फ़िराक़ ने जिस शहर का नाम रौशन किया आज वही शहर उन्हें भुला बैठा है और वह घर जहां से शायरी का ये सफर शुरू आज वह दूसरे के कब्ज़े में जाकर अपना वजूद खो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार फिराक गोरखपुरी का लक्ष्मीनिवास को पुर्वांचल का आनंद निवास कहा जाता था मगर आज इस इतिसातिक निवास पर अबैध कब्जा है।
ये देखने की बात है कि जहां देश पर जान देने वालों को इंण्डिया गेट पर हमेशा ज़िन्दा रखने की कोशिश की जाती है वहीं अपने क़लम की लहू के हर बूंद को निचोड़ कर आज़ादी की सुबह लाने के लिए कोशिश करने वालों का ये हशर हो रहा है।
मगर शायद अब दुनिया के अंदाज़ बदल चुके हैं तो लोगों को याद करने का भी नया तरीक़ा ईजाद किया जाना ज़रूरी था। हां इसीलिए तो उनके घर की जहां एक विरासत के तौर पर हिफ़ाज़त करनी चाहिए वहीं आज उसे हडपने के लिए सभी मुंह फैलाए हुए हैं।
मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई ना हमें
और हम भूल गऐ हों तुझे ऐसा भी नहीं
कभी फिराक ने इन्हीं शब्दों से अपने महबूब से कलाम किया था और आज उनको लोग यही कहकर पुकार रहे हैं कि ऐ फ़िराक़ हमने तुम्हें बहुत दिनों से याद नहीं किया है मगर हम तुम्हें भूले नहीं हैं, हमें तुम्हारी शायरी तो याद नहीं मगर तुम्हारा घर हमें तुम्हारी याद दिलाता रहता है।
यहां सवाल ये उठता है कि क्या ऐसी महान हस्तियों कि वरासत के साथ ऐसा होना चाहिए। शायद नहीं। मगर ऐसा हो रहा है और इसका तमाशा सभी देख रहे हैं। ये देखते हुए ये कहना ज़्यादा मुश्किल नहीं है कि भारत दूसरी चीज़ों की तरह से अपनी ये पहचान भी खोता जा रहा है। सरकार के लिए इस बात पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है कि इन हस्तियों के वरासत का बुरा हाल ना किया जाए वरना एक दिन ऐसा आएगा जब यहां की संस्कृति खुद से शर्म करेगी और ये कहती फिरेगी कि मैं तो ऐसी ना थी, मुझे ये पहचान क्यों दे दी गई?