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Friday, 18 December 2009

रात को ही क्यों...

एक वक्त था जब महबूबा से मिलने के लिए आशिक को रात से अच्छा वक्त कोई नहीं लगता था इस लिए वह जब आंचल रात का लहराए और सारा आलम सो जाए, तुम शमा जला कर ताज महल में मुझ से मिलने आ जाना की गुहार लगाया करता था, ज़ाहिर है हर किसी की चाहत भी तो यही होती है कि जब उस का महबूब उस की बाहों में हो और वह उसकी ज़ुल्फों में अपनी उंगलियां फेर रहा हो तो कोई उसे परेशान ना करे और इस चाहत को पूरा करने के लिए रात की तनहाई से अच्छा और कौन सा वक्त हो सकता है, इसी लिए महबूब के साथ चौदहवीं की रात को वक्त गुज़ारना बहुत दिलफरेब होता था, लगना भी चाहिए आखिर उस से अच्छा और क्या हो सकता है कि चांद अपनी खूबसूरत चांदनी के साथ दो प्यार भरे दिलों का साथ दे रहा हो।
मगर ये तो शायद उस वक्त की बात है जब हमारा जन्म भी नहीं हुआ था, हां शायद लैला मजनू और शीरीं फरहाद के ज़माने तक ही ये हालात रहे थे क्योंकि जब से हम इस दुनिया में आए हैं हमें तो कुछ और ही तजरूबा हुआ है। जैसे ही शाम का वक्त होता है, सूरज अपने बिस्तर समेटना शुरू करता है और सलेटी मायल सुर्ख आसमान के किनारे बहुत नीचे ढलान पर आफताब लुढ़कने लगता है तो कभी अम्मी आवाज़ देना शुरू कर देती हैं बेटा रात हो रही है कहीं मत जाओ, कभी बहन बाहर ना निकलने का मशवरा देती है तो कभी पापा घर पर ही रहने का फरमान सुना जाते हैं।
बच्पन से लेकर आज तक यही आलम है। दादी की अकसर कहानियों में जहां भी रात का ज़िक्र आता उसे सुनने में बहुत मज़ा आता था। रात की तारीकियों से जुड़ी कहानियां हमारी मुहब्बत बन चुकी थी।
एक बात हमारे दिमाग को हमेशा उलझाए रखती है कि आखिर ऐसा क्या था कि दादी तो इतनी अच्छी कहानियां सुनाती थीं और मां बाप हर बार रात से डराते ही रहते थे। समझ की उम्र को पहुंचने के बाद से ही इस पर गौर करने का दिल करने लगा। मुझे 'रात' की फितरत और उसके स्वभाव को समझने का चसका लग गया है। क्योंकि कहानियों के अलावा अगर मैंने हक़ीकत में अपने कानों से रात के मुतअल्लिक कुछ सुना तो यही मालूम हुआ कि 'रात' बुराईओं को जन्म देती है, हर दिन रात के बारे में नया तजरूबा होता है कभी कानों से आवाज़ टकराती है कि अंधेरा छाने लगा है, रात आने को है अपने घरों को चले जाओ तो कभी रात के सन्नाटों का खौफ़ दिला कर घरों में रहने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। खौफ़ और बुराईओं के लिए हमेशा से ही मैं ने रात को जाना है। मैं ने हमेशा यही पाया कि शायद रात ख़ौफ़, परेशानी, बुराई और ख़राबी की जड़ है। मैं ने इसके लिए ख़ुद तजरूबा किया। रात को उठ कर उस वक्त सुनसान रोड पर चला जब सारी दुनिया नींद की आग़ोश में खर्राटे लेती है, मगर क्या हुआ, मैं ने हर रात या तो ये महसूस किया कि किसी की चीख़ें मुझे आवाज़ दे रही हैं या कोई मदद के लिए गुहार लगा रहा नहीं तो किसी की हयात दम तोड़ रही है या फिर किसी की नब्ज़ उसका साथ छोड़ रही है और वह अपनी उखड़ी उखड़ी सांसों के साथ अलविदा कह रहा है।
ये सब देख कर मझे ये कुछ कुछ समझ आने लगा था कि आख़िर हमारे मां बाप हम्हें रात से क्यों डराते थे। शायद अब ज़माना बदल चुका था अब वह वक्त नहीं रह गया था जब रात भी दिन की तरह होता था जिसमें ना तो कोई ख़ौफ़ था और ना ही कोई डर। मगर आज कत्ल, ख़ून और दूसरी खतरनाक चीज़ें अंजाम देने के लिए रात का इस्तेमाल किया जाता था। मगर अब मुझे ये चीज़ खटकने लगी है कि आख़िर रात ही से क्यों डराया जा रहा है, दिन से क्यों नहीं? आख़िर वह कौन सा काम है जो अब दिन में नहीं होता? अब रात का इंतज़ार कौन करता है अब दिन में वह सब कुछ हो जाता है जिसे रात के काले साऐ में करने से आदमी डरता है तो फिर सिर्फ रात ही को क्यों बदनाम किया जाता है?

7 comments:

Sonalika said...

behter vichar
acha lekh
badhai

वन्दना said...

sahi kaha...........ab to din ho ya raat sab ek jaise hain ..........utne hi khofnak.

अमृत कुमार तिवारी said...

फासला बढ़ गया है। लेकिन फासला पहले भी था।
लोग रात में विचरण करने वालों को एक नाम दे दिए थे। निशाचर। यानी जो निशा(रात) में विचरण करने वाला हो। लेकिन एक काम करते हैं। निशाचर को रात का मुसाफिर बना दे तो कैसा रहेगा।
पता है सोच में उलझन पैदा हो गई होगी।

kshama said...

Ab raat ya din ho, khatere donon me hain...sahee kaha aapne..atyachar dono samay ho sakta hai!

शबनम खान said...

ab toh raat k naam se hi dar lagta ha razi sahab...vo raate kuch aur hoti thi jinki bate hamari dadi nani kia karti ha..aaj raat ka chehra bohot daravna ho gaya ha...

निर्मला कपिला said...

सही विचार है। अब दिन का उजाला रात के अन्धेरे से भी अधिक खतरनाक जो गया ह। धन्यवाद्

अमृत कुमार तिवारी said...

जनाब अगला पोस्ट कब लिख रहे हैं। बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं....कुछ शायराना अंदाज मिलता..कुछ उर्दू की लफ्ज हम भी सीख लेते...